Tuesday, 13 October 2015

जीवन में व्रत का क्या मूल्य है?
व्रत का मूल्य तो जरा भी नहीं, बोध का मूल्य है। व्रत का तो अर्थ ही होता है, बोध की कमी है। उसकी परिपूर्ति तुमने व्रत से कर ली।
तुमने देखा, झूठे आदमी ज्यादा कसमें खाते हैं। हर बात में कसम खाने को तैयार रहते हैं। झूठा आदमी कसम के सहारे चलता है। वह अपनी झूठ को कसम के सहारे सच बताना चाहता है।
पश्चिम में ईसाइयों का एक छोटा सा रहस्यवादी संप्रदाय है, क्येकर। वे अदालत में भी कसम खाने को राजी नहीं होते। सैकड़ों बार तो उनको इसीलिए सजा भोगनी पड़ी है, क्योंकि अदालत में वह कसम खानी ही पडेगी बाइबिल हाथ में लेकर कि मैं सच बोलूंगा। लेकिन क्वेकर्स का कहना भी बड़ा सही है, वे कहते हैं कि मैं सच बोलूंगा, यह भी कोई कसम खाने की बात है! और अगर मैं झूठ बोलने वाला हूं तो कसम भी झूठी खा लूंगा। यह बात ही फिजूल है, यह बात ही मूढ़तापूर्ण है। एक झूठे आदमी से कहो कि यह हाथ में लेकर कुरान या बाइबिल या गीता कसम खा लो कि सच बोलोगे। अब अगर वह आदमी सच में झूठा है, तो वह कसम खा लेगा कि लाओ, कसम खा लेता हूं। झूठ बोलने वाले आदमी को झूठी कसम खाने में कौन सी बाधा है! और सच बोलने वाला आदमी जरूर कहेगा कि मैं कसम क्यों खाऊं, क्योंकि मैं जो बोलता हूं वह सच ही है। कसम खाने का तो मतलब होगा कि बिना कसम खाए जो बोलता हूं वह झूठ है।
इसलिए क्येकर कसम नहीं खाते। वे कहते हैं, कसम खाने का तो मतलब ही यह हुआ कि बिना कसम खायी गयी बात झूठ है। हम सच ही बोलते हैं, कसम और गैर—कसम का कोई सवाल नहीं है!
व्रत का अर्थ होता है, कसम। व्रत का अर्थ होता है, समाज के सामने कसम। तुम गए मंदिर में, साधु—संन्यासी के पास, मुनि महाराज के पास, समाज की भीड़ में तुमने कसम खा ली। यह कसम तुम भीड़ में खाते हो। क्यों? क्योंकि तुम्हें अपने पर तो भरोसा नहीं है। तुम जानते तो हो कि अगर सबके सामने कसम खा ली कि अब धूम्रपान न करेंगे, तो अब प्रतिष्ठा का सवाल हो गया। अब अगर समाज में कहीं कोई धूम्रपान करता हुआ पकड़ लेगा, तो बेइज्जती होगी। तो तुमने धूम्रपान के खिलाफ अहंकार को खड़ा कर दिया। कसम का क्या मतलब है?
कसम का मतलब यह हुआ कि अब अहंकार को चोट लगेगी। लोग कहेंगे, अरे, तुमने तो कसम खा ली थी धूम्रपान न करने की, अब कर रहे हो! शर्म नहीं आती! मुनि महाराज के पास किस मुंह को लेकर जाओगे? मंदिर में कैसे प्रवेश करोगे? बाजार में कैसे निकलोगे? प्रतिष्ठा दाव पर लगा दी। कसम का मतलब यह है कि अब सबसे कह दिए कि आज से मैं सिगरेट नहीं पीऊंगा, कि धूम्रपान नहीं करूंगा। अब सारे लोग तुम्हारे पहरेदार हो गए, यह मतलब है कसम का। अब जो भी देखेगा छोटे से लेकर बड़े तक, वह कहेगा, अरे भाई! क्या कर रहे हो! कल तक कोई भी नहीं कह सकता था, क्योंकि तुम अपने मालिक थे। तुमने मालकियत इनके हाथ में दे दी। कल तक हो सकता था पत्नी से बचाकर पी लेते थे, पिता से बचाकर पी लेते थे, अब तुमको सबसे बचाकर पीना होगा, यह बहुत कठिन मामला है! कहां पीओगे? कैसे बचाओगे?
कसम का अर्थ है, भीतर तो बोध नहीं है, भीतर से तो तुम धूम्रपान छोड़ना चाहते नहीं। अगर भीतर से छोड़ना चाहते तो किसी के गवाही की क्या जरूरत थी, छोड़ दिया होता, बात खतम हो गयी। तुम्हें समझ में आ गयी बात कि धूम्रपान व्यर्थ है, बात समाप्त हो गयी। उसी क्षण समाप्त हो गयी, बचा क्या छोड़ने को? धूम्रपान में छोड़ने जैसा है क्या? पहले तो पीने की मूढ़ता की, अब छोड़ने की मूढ़ता कर रहे हो। पहले पीकर सोचते थे कुछ बड़ा काम कर रहे हो.।
अक्सर ऐसा होता है। सिगरेट पीते वक्त लोग बड़े अकड़कर बैठ जाते हैं, जैसे कोई बड़ा काम कर रहे हैं। छोटे बच्चे भी जल्दी बड़े होना चाहते हैं कि बड़े हो जाएं तो सिगरेट पीए। छोटे बच्चे भी बैठकर सिगरेट पीना चाहते हैं, क्योंकि सिगरेट पीने के साथ बड़प्पन का भाव जुड़ा है। ऐसा लगता है, कुछ खास हो गए। मैं एक गांव में रहता था। सुबह घूमने गया था, तो देखा एक छोटा सा बच्चा एक दो आने की मूंछ लगाए सिगरेट पी रहा है, एक झाडू के नीचे। मुझे देखकर वह छिपने लगा। मैं उसके पीछे भागा तो वह अपने घर में घुस गया। मैं उसके पीछे उसके घर में गया। वह एक पोस्ट—मास्टर का लड़का था। वह घबड़ा गया। उसने जल्दी से अपनी मूंछ छिपा ली, सिगरेट फेंक दी, उसका बाप आया कि क्यों आप मेरे लड़के के पीछे लगे हैं! उसको क्यों डरा दिए? मैंने कहा, डरा मैंने नहीं दिया, मैं पूछने आया हूं उससे कुछ। आपका लड़का गजब का है, जरा उसे बाहर लाएं।
वह लड़का बाहर डरता हुआ आया। मैंने पूछा कि तू यह क्या कर रहा था? बस मुझे तेरे से सिर्फ पूछना है, तुझे यह नहीं कहना है कि तू गलत कर रहा है, तू कर क्या रहा था? यह मूंछ लगाकर सिगरेट पीना? तब मैंने गौर से उसके बाप का चेहरा देखा, वैसी मूंछ बाप की है। बाप भी थोड़ा शर्माया। उसने कहा, यह करता है। यह कभी—कभी करता है। यह एक दो आने की मूंछ खरीद लाया है और इसने बिलकुल काटकर मेरे जैसी बना ली है। और सिगरेट मेरी पी जाता है!
मगर जब बाप की अकड़ देखता होगा तो उसको भी होता होगा कि अकड़ जाएं। छोटे —छोटे बच्चे सिगरेट पीकर सिर्फ ऐसा काम कर रहे हैं जिसमें प्रतिष्ठा है। सिगरेट में कुछ प्रतिष्ठा है।
तो जब तुम पीते हो तब अकड़कर पीते थे, अब तुमने छोड़ दिया! एक तो काम ही मूढ़तापूर्ण था। मैं पाप नहीं कह रहा हूं, ध्यान रखना, मूढ़तापूर्ण। मैं सिगरेट पीने वाले को पापी नहीं कहता, क्योंकि पापी कहना तो बड़ा सम्मान हो गया कि बडा काम कर रहे हैं, चलो पाप ही सही, मगर कुछ कर तो रहे हैं! कुछ ऐसा काम कर रहे हैं कि परमात्मा को भी इनका हिसाब रखना पड़ेगा। पाप का मतलब होता है, उस ऊपर की खाते—बही में तुम्हारा नाम लिखा जाएगा कि फलां सज्जन सिगरेट पीते हैं, दिन में इतनी पीते हैं! कुछ विशेष कर रहे हैं। पाप तो विशिष्ट हो गया। मैं सिर्फ कहता हूं मूढ़ता। परमात्मा की खाते —बही में कहीं भी नहीं लिखा होगा कि तुमने कितनी सिगरेट पी हैं, कि नहीं पी हैं। कि कौन से मार्के की सिगरेट पीते थे! अगर परमात्मा ऐसा करता हो तो तुमसे भी गया—बीता है। ये भी कोई हिसाब रखने की बातें हैं! तुम मूढ़ता करो और परमात्मा हिसाब रखे!
नहीं, मैं सिर्फ कहता हूं मूढ़ता। एक तरह की मूर्च्छा। जिसको बुद्ध ने प्रमाद कहा है। एक तरह का प्रमाद। प्रमाद शब्द में मूर्च्छा और अहंकार, दोनों का भाव है। इसलिए तो हम अहंकारी को भी कहते हैं, बड़ा प्रमादी। मूर्च्‍छित को भी कहते हैं प्रमादी। प्रमाद शब्द बड़ा बहुमूल्य है, उसमें मूर्च्छा और अहंकार, दोनों का जोड़ है। मूर्च्छित अहंकार, या अहंकारी मूर्च्छा।
तो एक तो सिगरेट पीकर तुम प्रमाद कर रहे थे। उतने से तुम्हारा मन न माना, अब मंदिर में जाकर तुम छोड़ आए। तुम्हारे मुनि भी तुमसे गए—बीते हैं जो बड़े प्रसन्न होते हैं—तुमने धूम्रपान छोड़ दिया। जैसे दुनिया का बड़ा कल्याण हुआ जा रहा है। तुम करते ही कुल इतना थे कि धुआ भीतर ले जाते थे, बाहर निकालते थे। तुम्हारे धुआ बाहर— भीतर निकालने से न दुनिया का अकल्याण हो रहा था, न कल्याण हो जाएगा बंद कर देने से। धुआ बाहर— भीतर निकालने से क्या कल्याण— अकल्याण का संबंध! हौ, तुम इतना ही बता रहे थे कि तुम बुद्ध हो।
लेकिन, अब ये मुनि महाराज कहते हैं, तुमने बड़ा काम किया कि व्रत ले लिया, कसम खा ली। धन्यभागी हो तुम! तुम्हारे जीवन में पुण्य की शुरुआत हुई।
पहली तो बात धुआ पीना और बाहर निकालना पाप न था; फिर धुआ निकालना, ले जाना छोड़ना पुण्य नहीं हो सकता। तुमने भी पुण्य की कैसी बचकानी बातें बना रखी हैं। जो लोग सिगरेट नहीं पी रहे हैं, वे सोच रहे हैं कि खाते—बही में बड़ा पुण्य लिखा जा रहा होगा कि देखो, यह आदमी सिगरेट नहीं पिता, यह आदमी पान नहीं खाता, यह आदमी तंबाकू नहीं खाता, यह आदमी यह नहीं करता, यह आदमी वह नहीं करता, तुम जरा सोचो तो तुम्हारे कितने पुण्य चल रहे हैं। जो—जो तुम नहीं करते, वह सब पुण्य है। तुम वेश्या के घर नहीं जाते, शराब नहीं पीते, पान नहीं खाते, सिगरेट नहीं पीते, ताश नहीं खेलते, पुण्य ही पुण्य कर रहे हो तुम! अब और क्या कमी है तुम्हारे जीवन में? महात्मा हो तुम! जरा देखो भी तो कि कितने पुण्य कर रहे हो! जो —जो तुम नहीं कर रहे हो, उसको गिन लो।
जिस दिन तुम सिगरेट पीना छोड़ देते हो, उस दिन तुमने कोई पुण्य किया? तुमने सिर्फ अपने पर थोड़ी अनुकंपा की जरूर, मगर पुण्य इत्यादि कुछ भी नहीं। तुम थोड़े समझदार हुए जरूर, मगर पुण्य इत्यादि कुछ भी नहीं।
कल हमने बुद्ध के भिक्षु की बात कही जो झाडू लगाया करता था। अब क्या तुम सोचते हो, झाडू लगाना छोड़ देने से पुण्य हुआ? कि भगवान कहेगा कि धन्यभागी! तेरा बड़ा सौभाग्य कि तूने झाडू लगाना छोड़ दिया! इसकी कहीं पुण्य में गिनती होगी!
अगर तुम गौर से समझो तो इस जमीन पर पाप के नाम से तुमने जो किया है, वह नासमझी है। और पुण्य के नाम से उस नासमझी को मिटाते हो। पुण्य क्या है? चोरी की, चोरी कर—करके धन इकट्ठा कर लिया, फिर दान करके पुण्य कर दिया। पहले धनी होने का मजा ले लिया, फिर पुण्यात्मा, दानी होने का मजा ले लिया। और दोनों निर्भर हैं धन पर। और धन का कोई मूल्य ही नहीं है। धन दो कौड़ी का है। मिट्टी है। पहले मिट्टी इकट्ठी करके मजा ले लिया, तब अखबारों में खबर छप गयी कि देखो, कितनी मिट्टी इकट्ठी कर ली इस आदमी ने। और फिर मिट्टी दान करके मजा ले लिया। फिर अखबारों में खबर छप गयी कि यह आदमी पुण्यात्मा हो गया।
व्रत बेईमानी है। समझदार के जीवन में क्रांति होती है, व्रत नहीं होते।

Monday, 12 October 2015

आपने कल ऐसा आदेश क्यों दिया कि संबोधि—दिवस के नृत्य में केवल संन्यासी ही भाग लेंगे? औरों को भाग लेने से क्यों रोक दिया?
जो मुझमें भाग लेने को तैयार नहीं, उसमें मैं भी भाग लेने को तैयार नहीं। धीरे— धीरे हिम्मत करो। तुम अपने हृदय का द्वार मेरे लिए खोलोगे, तो ही मेरा हृदय का द्वारा तुम्हारे लिए खुल सकता है। नहीं कि तुम्हारे लिए बंद है, लेकिन खुल न सकेगा। मेरे हृदय के खुलने की कुंजी भी तुम्हारे हृदय के खुलने में छिपी है।
तो धीरे— धीरे तो मैं उनके लिए ही रहूंगा, जो डूबे हैं। डूबोगे तो ही मेरे साथ चल सकोगे। भीड़— भाड़ में मुझे रस नहीं है। मैं कोई राजनेता नहीं हूं कि भीड़— भाड़ में मेरी उत्सुकता हो। मेरी उत्सुकता उन थोड़े से लोगों में है जो सच में ही खोजने को तत्पर हैं। और कुछ दाव पर लगाने की भी हिम्मत रखते हैं।
संन्यासी का क्या अर्थ होता है? जिसने कुछ दाव पर लगाया। तुम दाव पर तो कुछ भी नहीं लगाना चाहते हो, पाना तुम सब चाहते हो। ऐसी होशियारी से काम न चलेगा।
तो धीरे— धीरे और तरह से भी संन्यासी में ही मैं उत्सुक रह जाऊंगा। क्योंकि संन्यासी का अर्थ इतना है कि वह मेरे साथ डूबने को तैयार है। ले जाऊं अंधेरे में तो अंधेरे में जाने को तैयार है। संन्यासी का अर्थ है, उसे मुझ पर भरोसा आया।
गैर—संन्यासी संन्यासियों की तरंग में थोड़ी सी बाधा डालता है। इसलिए नाचने से मना कर दिया। गैर—संन्यासी नाचते हुए संन्यासियों के बीच में उनकी भाव—समाधि में बाधा बनता है। क्योंकि वह तो उतना खुला नहीं, वह तो बंद है। जो संन्यास लेने की हिम्मत नहीं कर सका, वह नाच भी सकेगा? और जो नाच सकता है, उसे संन्यास लेने में अड़चन क्या होगी? ये दोनों ही पागलपन के काम हैं।
तो इसके पीछे एक सरणी है। अब मैं चाहूंगा कि यहां एक तरंग हो। इस तरंग में जो लोग जीने को राजी हैं, वे ही उसमें डूबे। जो नहीं हैं राजी, उनके लिए बोलता रहूंगा, ताकि आज नहीं कल वे राजी हो जाएं। तो बोलने के लिए मैं तैयार हूं गैर—संन्यासी से भी। लेकिन धीरे— धीरे जो गहरे तल की बातें हैं, जो भीतर घटती हैं, उनके लिए संन्यासी के अतिरिक्त दूसरे के लिए उपाय नहीं होगा।
मुझे फर्क करने ही होंगे। नहीं तो तुम्हें तो कुछ लाभ नहीं होता है, संन्यासी को नुकसान होता है। तुम सोचते हो, पूछने वाले ने इसीलिए पूछा है कि जैसे उसको कुछ हानि हुई। उसको कुछ हानि नहीं होने वाली। तुम्हारे पास कुछ है नहीं, हानि क्या होगी! तकलीफ तुम्हें सिर्फ यही हुई होगी कि कोई बात ऐसी थी जिसमें तुम्हें प्रवेश का अधिकार न मिला। तुम्हारे अहंकार को चोट लगी होगी। इस अहंकार को लेकर तुम सम्मिलित भी हो जाते तो तुम्हारे कारण केवल एक व्याघात पैदा होता। तुम बेसुरे होते। तुम उन पागलों की भीड़ में समझदार होते। तुम एक पत्थर की तरह होते उस धारा में।
तुम्हारे कारण धारा को बहने में सहायता न मिलती, बाधा पड़ती। तुम्हारा कुछ नहीं खोया है। ही, अगर तुम सम्मिलित होते तो जो संन्यासी नाच रहे थे, उनका कुछ खो जाता। नाचकर वे मेरे साथ किसी गहरी छंदोबद्धता में गिर रहे थे। उसका तुम्हें पता भी नहीं है। इसलिए जिनको हुआ, वही जानते हैं। जिनको नहीं हुआ, उनको तो बाहर से ऐसा लगा कि संन्यासियों को नाचने मिला, हमें नाचने न मिला। तुम्हारे नाचने की आकांक्षा बलवती नहीं है, अन्यथा तुम संन्यासी होने की हिम्मत करोगे, तुम कहोगे कि ठीक है, अगर नाचना है तो यह शर्त भी स्वीकार करेंगे। अगर तुमने कुछ खोया है, तो तुम संन्यास की हिम्मत जुटाओगे। क्योंकि तुम दुबारा वैसा न खोना चाहोगे।
लेकिन नहीं, तुम्हें कुछ अड़चन दूसरी है। तुम्हारी अड़चन यह है कि तुम्हारे साथ कुछ पक्षपात किया गया। तुम्हारे अहंकार को कुछ बाधा पड़ी है। तुम्हें क्यों न नाचने दिया गया! तुम्हारी पात्रता में कौन सी कमी है! कमी है। साहस की कमी है। हिम्मत की कमी है। तुम सत्य को मुफ्त पाना चाहते हो। तुम सत्य को वैसे ही पाना चाहते हो जैसे तुम हो। तुम कुछ भी बदलने को तैयार नहीं हो। तुम दो कदम बढ़ने को तैयार नहीं हो। और मैं तुमसे कहता हूं कि तुम एक कदम चलो तो परमात्मा हजार कदम तुम्हारी तरफ चलता है। लेकिन तुम एक कदम भी चलने को राजी नहीं हो। हालत तो और भी उलटी है। हालत तो ऐसी है कि परमात्मा अगर तुम्हारी तरफ चले तो तुम पीछे हट जाओगे।
एक मजिस्ट्रेट के सामने एक आदमी को पकड़कर लाया गया। क्योंकि वह कार चला रहा था और कोई साठ—सत्तर मील की रफ्तार से जा रहा था, जहा कि बीस मील की रफ्तार से जाने की ही आज्ञा थी, उससे ऊपर नहीं। उस आदमी ने कहा कि सिपाही गलत कह रहा है, ज्यादा से ज्यादा मैं पैंतीस—चालीस की रफ्तार से जा रहा था। मजिस्ट्रेट ने कहा, वह भी ज्यादा है, दुगुनी तो वह भी है। दंड तो उसमें भी होगा, क्योंकि बीस की आशा है, तुम चालीस से जा रहे थे।
लेकिन उसकी बगल में जो दूसरा आदमी बैठा था कार में, उसने कहा कि क्षमा करिए, जहा तक मैं समझता हूं, रफ्तार बीस—पच्चीस से ज्यादा नहीं थी। और उसकी पत्नी ने, जो पीछे बैठी थी, उसने कहा कि मैं भलीभांति जानती हूं कि मेरे पति दस—पंद्रह से ज्यादा की रफ्तार से चलाते ही नहीं।
इसके पहले कि चौथा आदमी जो कि पीछे की सीट पर बैठा था, वह बोले, मजिस्ट्रेट ने कहा, रुको। कहीं ऐसा न हो कि तुम यह कहने लगो कि यह आदमी गाड़ी को पीछे की तरफ ले जा रहा था। अब रुक जाओ, बस! क्योंकि तुम धीरे— धीरे पैंतालीस, चालीस, पच्चीस, पंद्रह पर आ गए, अब कहीं ऐसा न करना कि तुम पीछे गाड़ी को ले जा रहे थे, यह कहने लगो।
परमात्मा तुम्हारी तरफ आए, तो तुमने कभी पूछा है, तुम कहीं गाड़ी को पीछे की तरफ तो न ले जाने लगोगे? तुम हिम्मत से खड़े रहोगे अपनी जगह पर? तुम अपने हाथ आलिंगन के लिए फैलाओगे? क्योंकि मैं जानता हूं इसलिए ऐसा कह रहा हूं। बहुतों को मैं जानता हूं जिनके पास मैं गया हूं और वे पीछे हट गए हैं। इसलिए कह रहा हूं। तो अब कृपा करके मुझे उन पर काम करने दो जो पीछे नहीं हटेंगे, जिनका मुझे भरोसा है। और अगर मैं जाऊंगा उनकी तरफ, दो कदम बढ़कर स्वागत करेंगे। केवल उनमें ही प्रवेश हो सकेगा।
कल जो घटा है, एक तो बाहर से दिखायी पड़ने वाली घटना है कि मैं आंख बंद किए यहां बैठा हूं और लोग नाच रहे हैं। इतना तो कोई भी देख लेगा। इतना देखने के लिए तो कुछ भी आंख चाहिए नहीं। अंधा भी अंदाज लगा लेगा, अनुमान कर लेगा। छोटा बच्चा भी देख लेगा। इसके लिए कोई बहुत बुद्धिमानी की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर तुम्हारे पास थोड़ी भीतर की आंख हो तो तुम कुछ और देखोगे कि कुछ और घट रहा है। मैं एक तरंग में अपने को ले जा रहा हूं और मेरी तरंग के साथ कुछ लोग धीरे— धीरे डुबकी ले रहे हैं। उसमें मैं बाधा नहीं डालना चाहता।
इसलिए गैर—संन्यासी को अब धीरे— धीरे हक कम होते चले जाएंगे। जैसे—जैसे मेरे पास संन्यासियों की संख्या बड़ी होती जाएगी वैसे—वैसे गैर—संन्यासी के लिए हक कम होते जाएंगे। इसके पहले कि तुम्हारे हक बिलकुल खो जाएं, तुम जल्दी करो!

Sunday, 11 October 2015

धारणा के बिना कैसे कोई जानेगा कि क्या पथ है और क्या कुपथ; क्या ग्राह्य है और क्या त्याज्य; क्या पुण्य है और क्या पाप; और अंततः क्या द्रष्टा है और क्या दृश्य?
धारणा के बिना जानने की जरूरत ही नहीं है। क्‍योंकि धारणा के बिना तुम हो गए कि तुम जहां हो वहीं पथ है। तुम जो हो, वहीं द्रष्‍टा है।
कल मैं पढ़ता था मिर्जा गालिब के संबंध में। मिर्जा तो पियक्‍कड़ थे, शराबी थे। एक आदमी आ गया—पंडिताऊ किस्म का आदमी, धार्मिक किस्म का आदमी—वह शराब के खिलाफ समझाने लगा। बड़ी बातें करने लगा शराब के खिलाफ। मिर्जा बड़ी देर तक सुनते रहे, फिर बोले कि भाई, एक बात तो बता कि अगर कोई शराब पीता ही रहे तो सबसे बड़ा हर्जा क्या है? सबसे बड़ा नुकसान क्या है? तो उस आदमी ने कहा, सबसे बड़ा नुकसान यह है कि शराबी आदमी कभी परमात्मा की प्रार्थना नहीं करता, कर नहीं सकता। तो मिर्जा ने जोर से ताली बजायी और कहा, अरे पागल, शराबी प्रार्थना करेगा भी किस चीज के लिए? जो चाहिए वह मिला ही हुआ है। यह तो तुम लोग करो प्रार्थना वगैरह। शराबी को प्रार्थना करने को है ही क्या और!
तुम पूछते हो कि ‘जिसकी धारणा खो गयी हो, वह कैसे जानेगा कि पथ क्या है?’ जानने की जरूरत ही नहीं है। जिसकी धारणा खो गयी उसका अर्थ है, मन खो गया। क्योंकि मन धारणाओं का संग्रह है। जिसका मन खो गया, वह पथ पर है। उसी को बुद्ध ने सम्यक पथ कहा है। ठीक—ठीक मार्ग कहा है। जहां मन न रहा, वहां गैर ठीक होने का उपाय न रहा।
तुम्हारी तकलीफ भी मैं समझता हूं। समझो कि एक आदमी चश्मा लगाने का आदी है और कोई उससे कहे कि तेरी आंख ठीक हो जाएगी, तू चश्मा छोड़! तो वह कहे मैं चश्मा छोड़ दूं तो फिर देखूंगा कैसे? हम उसको कह रहे हैं कि तेरी आंख ठीक हो जाएगी, तू चश्मा छोड़! वह कहता है, आंख ठीक हो जाएगी, वह तो ठीक, लेकिन फिर मैं देखूंगा कैसे? उसने सदा चश्मे से देखा है। वह सोचता है, चश्मे के बिना देखना होगा ही कैसे?
मन से ही हमने सदा जाना है, क्या ठीक और क्या गलत—हालांकि जान कभी नहीं पाए, मान लिया है कि यह ठीक और यह गलत। हमें कभी दर्शन तो हुआ नहीं ठीक—ठीक कि क्या गलत है और क्या ठीक है। फिर मन कहता है, यह ठीक, मगर करते कहां हम! करते तो वही जो मन कहता है कि ठीक नहीं है। करते कुछ, कहते कुछ, मन की यही तो सब बिबूचन है, विडंबना है। मन गया कि वही होता है जो होना चाहिए। व्याख्या नहीं रह जाती, सत्य दिखायी पड़ता है, व्याख्या खो जाती है। व्याख्या और सत्य में बड़ा फर्क है।
एक गुलाब का फूल खिला, तुम कहते हो, अगर हमने सुंदर— असुंदर की धारणा छोड दी तो फिर हम कैसे इसके सौंदर्य का मजा लेंगे। तुमने अभी इसका मजा लिया ही नहीं है। जब तुम कहते हो, यह सुंदर है, तभी मजा खो गया। एक ऐसा भी मजा है, जब न तो सुंदर का शब्द उठता है, न असुंदर का। फूल होता है, तुम होते हो, दोनों के बीच अपार लेन—देन होता है, एक शब्द नहीं उठता, न सुंदर का न असुंदर का। तब तुम्हें इसके सौंदर्य का वास्तविक अनुभव होता है। कहते नहीं तुम कि सुंदर है, कहने की जरूरत नहीं है, स्वाद लेते हो। जब तुम कहते हो, सुंदर है, तब तो तुम सिर्फ थोथी बात कर रहै हो—तुम्हें कुछ अनुभव नहीं हो रहा है, तुमने बाप—दादों से सुना है, गांव के लोगों से सुना है, गुलाब का फूल सुंदर होता है, तो तुम कह रहे हो सुंदर है।
तुमने देखा, अभी नयी—नयी फैशन दुनिया में चली है—कैक्टस। लोग घर में कैक्टस लगाने लगे। गुलाब तो गया! अब गुलाब को कौन पूछता है! गुलाब तो पुरानी परंपरा की बात हो गयी। गुलाब तो हट गए हैं बड़े बंगलों से। यह गुलाब तो दकियानूसी हो गया है। कितने पुराने दिनों से लोग गुलाब की प्रशंसा कर रहे हैं, हटाओ! कैक्टस आ गया है। नागफनी! जिसको कभी लोग घर में नहीं लाते थे। गांव के बाहर खेत—खलिहान के आसपास लगाते थे कि जानवर वगैरह न घुस जाएं। नागफनी को कौन घर में लाता था!
अब नागफनी सम्राट होकर विराजी है। बैठकघरों में बैठी है! और लोग कहते हैं आकर, आह! कैसी प्यारी नागफनी है। और इन्हीं लोगों ने कभी इसके पहले नहीं कहा था कि प्यारी नागफनी! हवा बदल गयी। अब गुलाब की प्रतिष्ठा नहीं रही। नागफनी की प्रतिष्ठा हो गयी। लोग तो शब्दों से जीते हैं, प्रचार से जीते हैं। जिस चीज का प्रचार हो जाता है, उसी को सुंदर — असुंदर कहने लगते हैं, सौंदर्य— असौंदर्य का अनुभव थोडे ही है कुछ।
एक ऐसा अनुभव भी है जहा शब्द बनते ही नहीं। निःशब्द रहते हैं प्राण। अनुभव इतना सघन होता है कि शब्द बनाने की फुरसत किसे होती है! सब ठगा और अवाक रह जाता है! तब एक चीज दिखायी पड़ती है जो वास्तविक है।
मैंने सुना, एक वैज्ञानिक था—बड़ा वैज्ञानिक। खासकर विद्युत के यंत्रों में उसकी बड़ी क्षमता थी। वह अपनी लड़की के संबंध में बड़ा चिंतित था, क्योंकि एक लडका उसकी लड़की के पीछे पड़ा था। पुराने ढंग का बाप होता, डंडे मारकर निकाल देता। पुराने ढंग का भी नहीं था, आधुनिक आदमी थी। पर आधुनिकता तो ऊपर रहती है, भीतर तो पुराना ही चलता रहता है। तो भीतर तो बाप को अड़चन भी होती थी कि यह कहां उसको वह कहता था, वह बंदर कहां है? —वह लड़के को। कि वह फिर आ गया बंदर। वह उसको बिलकुल बर्दाश्त के बाहर था। और वह घंटों बैठकर लड़की से बैठकखाने में गपशप करता, आधी—आधी रात तक दोनो बैठे रहते। आखिर उसकी बर्दाश्त के बाहर हो गया, उसको यह बड़ी बेचैनी रहने लगी कि ये दोनों करते क्या हैं बैठकर?
आधुनिक बाप था, तो बीच में जाकर खड़ा भी नहीं हो सकता था, पुराने जमाने के दिन गए कि बीच में जाकर खड़ा हो जाए। क्योंकि उससे आधुनिकता मरती है कि लोग कहते हैं—यह. भी क्या बात है, लड़की तो प्रेम करेगी ही! और बंदर! बंदर तो सभी हैं, डार्विन ने सिद्धे ही कर दिया है, अब इसमें क्या! सभी बंदर की औलाद हैं, तो यह भी सही। फिर लड़की को पसंद है तो तुम्हें क्या बाधा?
तो उसने एक तरकीब बनायी—वैज्ञानिक था बड़ा! उसने जिस कमरे में लड़का और लड़की बैठकर प्रेमालाप चलाते थे, उसमें एक छोटा सा यंत्र लगा दिया सीलिंग पर। और अपने कमरे में एक रडार का पर्दा लगा दिया। उस यंत्र से उसके रडार पर रंग बन जाते। अगर लडका लड़की का हाथ पकड़ता, तो स्वभावत: लड़का—लड़की जवान, अभी प्रेम में पड़े, तो काफी गर्मी पैदा होती जब हाथ पकड़ते—तो वह जो गर्मी को पकड़ने वाला यंत्र था, वह जल्दी से गर्मी पकड़ लेता और रडार के पर्दे पर लाल रंग आ जाता। तो वह समझ जाता कि अच्छा, हाथ पकड़ा उस बंदर के बच्चे ने! अगर वे एक—दूसरे का चुंबन लेते तो हरा रंग आ जाता। तो वह बंदर का बच्चा चुंबन ले रहा है लड़की का! या कभी आलिंगन करते, तो नीला रंग आ जाता। ऐसे उसने रंग बना रखे थे।
एक दिन वैज्ञानिकों की एक काफ्रेंस चल रही थी तो उसे जाना पड़ा। वह बड़ा बेचैनी में गया, क्योंकि वह बंदर, जब वह बाहर जा रहा था, वह अंदर घुस रहा था। तो उसने अपने छोटे बेटे को कहा, सुन बेटा, तू जाकर अंदर बैठ जा, वहा पर्दा लगा है, उस पर देखते रहना और यह कागज ले ले, इस पर नोट करते जाना कि कौन सा रंग किस क्रम से आया। बेटे को कुछ पता नहीं था कि यह रंगों का मतलब क्या है। बेटा तो समझा कि बाप एक काम दे गया है तो वह बड़ी मुस्तैदी से जाकर बैठ गया और रंग लिखने लगा कि कौन सा रंग पहले, कौन सा पीछे, कब क्या आया। और बाप जल्दी से गया काफ्रेंस में, वह किसी तरह खतम करके, उसको तो बेचैनी यही थी कि वहा रंग कौन से आ रहे हैं? लेकिन इससे पहले कि वह घर आए, बेटा भागता हुआ कांफ्रेंस भवन में पहुंच गया। बाप ने पूछा, क्या हुआ, ऐसा भागा हुआ क्यों आ रहा है? उसने कहा, अरे पिता जी, गजब हो गया! उसके बाप ने पूछा, क्या हुआ, जल्दी बोल! अरे, उसने कहा, इंद्रधनुष आया है! तो उसको कुछ पता नहीं था। सभी रंग एक साथ आ रहे हैं!
इस बच्चे को कोई व्याख्या तो नहीं है, लेकिन जो है वह तो दिखायी पड़ रहा है। बाप के मन में व्याख्या है, बाप ने तो सिर पीट लिया। वह लड़के की तो समझ में नहीं आया, उसने कहा, आप क्यों सिर पीट रहे हैं? अरे, इतना गजब का इंद्रधनुष बना है कि देखते रह जाओ! मैं तो भागा आया कि आप चूक जाएंगे, चलिए! लड़के की प्रसन्नता।
जब सारी धारणाएं खो जाती हैं, जब कोई धारणा नहीं रह जाती—क्या अच्छा, क्या बुरा, क्या सुंदर, क्या असुंदर, क्या नीति, क्या अनीति—तब जीवन में जो है, जैसा है, अपूर्व रूप से प्रगट होता है, और कोई व्याख्या नहीं होती। तुम होते हो और जीवन का सत्य होता है—जैसा है, वैसा ही। इसलिए इससे भयभीत न होओ। सब धारणाएं सीमा बनाती हैं और सब व्याख्याएं क्षुद्र हैं। निर्व्याख्य ही विराट है।

Saturday, 10 October 2015

आपके पास आकर मुझे लगता है कि मैंने जीवन में सब कुछ पा लिया। लेकिन कभी—कभी ऐसा भी लगता है कि यहां आकर मैंने अपना जीवन गंवा दिया।
दोनों ही बात सच हैं। और दोनों साथ ही होंगी तो ही हो सकती हैं। यहां आकर कुछ गंवाना होगा तभी तो कुछ पाओगे न! जितना गवाओगे, उतना ही पाओगे। उसी अनुपात में पाओगे। जो कुछ भी न गंवाके, वे कुछ भी न पाएंगे। वे खाली हाथ आएंगे और खाली हाथ जाएंगे। मुझ पर फिर नाराज मत होना। फिर यह मत कहना कि हम गए भी, आए भी, कितना गए, कितना आए, कुछ न मिला। गंवाओगे तो ही पाओगे। दाव पर लगाओगे तो ही पाओगे।
तो पूछा ठीक है, गीता ने पूछा है, ‘ आपके पास आकर मुझे लगता है कि मैंने जीवन में सब कुछ पा लिया। लेकिन कभी—कभी ऐसा भी लगता है कि यहां आकर मैंने अपना सारा जीवन गंवा दिया।’
इन दोनों में विरोध नहीं है। गंवाया, इसीलिए पाया। कुछ थोड़ा—बहुत, गीता, बचा रखा हो, उसको भी निकाल ले, उसको भी गंवा दे। जरूर थोड़ा—बहुत बचाया होगा, नहीं तो यह प्रश्न उठता नहीं। अगर बिलकुल ही गंवा दिया होता तो यह प्रश्न ही नहीं उठता, तुझे खुद ही दिखायी पड़ जाता कि यह तो गंवाना पाना हो गया। गंवा दो, रत्ती—रत्ती, तोला—तोला, कुछ बचाओ मत, तो मिल जाएगा सब। क्योंकि यह तो प्रक्रिया ही अपने को खोकर पाने की है। और गंवाकर पछताओगे न, इतना कहता हूं बचाकर जरूर पछताओगे। फिर मत कहना। क्योंकि यह हो भी सकता है, यह अवसर आज है, कल न हो। फिर पछताओगे कि गंवा ही क्यों न दिया!
वह तितली कागजी थी
जो कभी मेरे मन—कुसुम को बेध गयी
वह आस्था मृगजल थी
जो आंखों के दर्पण में मोती—सी चमकी थी
वह विश्वास जो हिमालय—सा अडिग
पानी पर बहता हुआ काठ का टुकड़ा था
वह सत्य शिव सुंदर जो आत्मा से उदभूत
महज एक दिखावा था
मेरी जिंदगी में सभी कुछ जो था या है
झूठ निकला
मित्रो, औरों से तुम ठीक ही कहते होओगे
मैं मूर्ख निकला
अगर तुमने न गंवाया तो एक दिन तुम यही पाओगे कि तुमने बड़ी मूढ़ता कर ली। जो बचाया, पानी पर बहता हुआ काठ का टुकडा था। जो बचाया, आंखों के दर्पण में मोती—सी चमकी थी, वह आस्था मृगजल थी।
वह तितली कागजी थी
जो कभी मेरे मन—कुसुम को बेध गयी
महज एक दिखावा था
मेरी जिंदगी में सभी कुछ जो था या है
झूठ निकला मित्रो, औरों से तुम ठीक ही कहते होओगे मैं मूर्ख निकला
गंवा लो, तो तुम्हें यह पछतावा न होगा। और गवाओगे क्या, तुम्हारे पास जो है काठ का टुकड़ा है। चाहे तुम सोना समझ रहे होओ। मगर तुम्हारे पास गंवाने को कुछ वास्तविक संपदा थोड़े ही है।
इसलिए मैं बार—बार कहता हूं कि जो नहीं है तुम्हारे पास, उसे जाने दो। है ही कहां? और तब तुम्हारे पास जो है, वह प्रगट हो जाएगा। इसलिए मैं ऐसा भी कहता हूं कि जो तुम्हारे पास नहीं है, उसे मुझे छीन लेने दो, ताकि मैं तुम्हें वह दे सकूं जो तुम्हारे पास है। लेकिन लोग बड़े घबड़ाते हैं। लोग ऐसे हैं कि सपने टूट जाते हैं तो उन पर भी रोते हैं। छोटे—छोटे बच्चे देखे न, कभी—कभी छोटा बच्चा सुबह से उठकर रोने लगता है, क्योंकि वह सपने में एक बड़ी गुड़िया—लिए खेल रहा था—बड़ी सुंदर गुड़िया थी—वह कहता है, कहा है मेरी गुड़िया? टटोलता है बिस्तर में। मां कहती है, सपना था, मगर वह सुनता नहीं। अभी सपने और सच में उसे भेद ही नहीं हुआ है।
सपनों पर भी लोग रोते हैं। बहुत कम लोग हैं जो वस्तुत: मानसिक रूप से प्रौढ़ हो पाते हैं। अधिक लोग तो सपनों पर ही रोते हैं। किसी का प्रेम था और टूट गया।
परसों एक युवक आया, किसी के प्रेम में पड़ गया है। कहने लगा, मर जाऊंगा अगर यह स्त्री न मिली। तेरी मर्जी! मगर कोई कभी मरता—वरता नहीं। एक आदमी नें—उससे मैंने कहा—एक स्त्री से ऐसे ही कहा था कि अगर तूने मुझे न चुना, या मेरे साथ विवाह न किया, मैं मर जाऊंगा। मान रखना, मर जाऊंगा, वक्त नहीं। और निश्चित वह मरा, साठ साल बाद।
मर जाऊंगा? यह स्त्री कल तक दिखी भी नहीं थी, तब तक जी रहे थे, कोई अड़चन न थी इसके न होने से। आज इसके होने से, लगता है अगर न मिली तो मर जाऊंगा। कल फिर इसे भूल जाओगे। ये सपने हैं, उठते हैं, जाते हैं, टूट जाते हैं, बबूले हैं। कल फिर भूल जाओगे। कल फिर किसी और स्त्री के मोह में पड़ जाओगे और यही फिर कहने लगोगे कि मर जाऊंगा अगर न मिली।
मुल्ला नसरुद्दीन एक स्त्री से कह रहा था कि अगर तू मुझे न मिली तो मर जाऊंगा। तो उस स्त्री ने कहा, मुल्ला, सच कहते हो? उसने कहा, यह मेरी पुरानी आदत है, यह मैं कई स्त्रियों से कह चुका। यह कोई नया नहीं है, इसका मुझे पुराना अभ्यास है।
सपने पर तुम जान दांव पर लगाने को तैयार हो जाते हो। कोई कहता है, अगर पद न मिला तो मर जाऊंगा। कोई कहता है, अगर धन न मिला तो मर जाऊंगा। और अगर नहीं मिलते तो लोग बड़े रोते हैं।
छोड़ो भी, क्या सपनों के शव पर रोते हो
अरे, किरन का अतिथि द्वार पर खड़ा हुआ
तुम हो कि अंधेरे के स्वागत में लीन हुए
जीवन का मंगल—गीत बुलावा भेज रहा
तुम हो कि मर्सिया पढ़ते हो गमगीन हुए
पुतलियां दृगों की बांध रहीं नूतन पलना
तुम हो कि अभी तक पलकों में शव ढोते हो
छोड़ो भी, क्या सपनों के शव पर रोते हो
कम हो गया अगर तो नव मोती बींधो
पर न अधूरी छोड़ो जीवन की माला
आंसू पोंछो सब शोक भुला मुस्काओ तुम
वह सुनो प्रभाती गाता पथ में उजियाला
सपना ही तो टूटा है, नहीं हृदय टूटा
फिर क्यों जीवन के प्रति —निराश तुम होते हो
छोड़ो भी, क्या सपनों के शव पर रोते हो
और लोग रोते हैं। खूब रोते हैं, जार—जार रोते हैं। जीवन में रोना मिटता ही नहीं। जब तक सपने साफ—साफ समझ में नहीं आते कि सपने हैं, तब तक आदमी रोता है। कभी इस सपने के टूट जाने पर, कभी उस सपने के टूट जाने पर। और सपने तो टूटेंगे ही, सपने तो टूटने को ही हैं। सपनों को तुम कितना ही सम्हालकर रखो, रख नहीं सकते, वे टूटेंगे ही। वे बड़े नाजुक हैं। कांच के बर्तन ‘हैं। वे टूटेंगे ही, फिर रोओगे।
गीता से मैं कहना चाहूंगा, जो तूने छोड़ा उसमें था भी क्या? जो गया, उसमें था भी क्या? और गीता को मै भलीभांति जानता हूं, बहुत वर्षों से जानता हूं, मैंने तो कभी कुछ देखा नहीं कि इसके पास कुछ था। मगर सपने होंगे, सपने बसाए होंगे मन में। स्त्री है, सपने बसाए होंगे—शादी—विवाह करेगी, किसी धनपति से विवाह करेगी, कोई बड़ा बंगला बनाएगी, केडिलक कार खड़ी करेगी, ऐसा होगा, वैसा होगा, ऐसे सपने स्त्रियां बनाती हैं।
स्त्रियों के सपने, पुरुषों के सपने थोड़े अलग— अलग होते हैं, पर सपने तो सपने हैं। बच्चे होंगे, ऐसे सपने उसने संजोए होंगे। वही सपने चले गए और तो कुछ था नहीं जाने को। न तो कोई मकान था, न कोई केडिलक गाड़ी थी, न कुछ था। और होते भी तो भी उनके होने में क्या होता है? और फिर भी नासमझ है। क्योंकि मुझे पता है, उसने पहले विवाह भी किया था, और दुःखी हो गयी, बहुत दुखी हो गयी। अपने पति को लेकर एक बार मेरे पास आयी थी, वर्षों बीत गए। तब किसी तरह पति से उसकी झंझट छुड़वायी थी। उसको मुक्‍त करवाया था किसी तरह कि छूट जा, अब नहीं बनता दोनों का तो क्‍या सार है!
कुछ था क्या, जो छूट गया हो। है तो कुछ भी नहीं हाथ में, मगर आदमी मुट्ठी बंद रखता है, सोचता है, भीतर कुछ है।
दो पागल बैठे एक —दूसरे से बात कर रहे थे। एक मुट्ठी बांधकर बोला कि अच्छा शर्त लगाता हूं, बता दे कि मेरी मुट्ठी में क्या है तो यह दस रुपए का नोट। उस आदमी ने सोचा, उसने कहा कि भाई, कुछ थोड़ा इशारा तो दो। थोड़े इंगित, मतलब अब एकदम से संसार इतना बड़ा है! इसमें कौन सी चीज तुम्हारी मुट्ठी में हो, क्या पता! कुछ इशारा। कम से कम तीन इशारे तो चाहिए ही। मगर पहला पागल बोला कि इशारे अगर चाहते हो फिर ये दस रुपए नहीं मिलेंगे। ये दस रुपए तो मिलते ही हैं बिना इशारे के अगर तुम बोल दो। तो उसने थोडा सोचा, उसने कहा कि हो न हो हाथी है तेरे हाथ में।
उस पहले पागल ने धीरे से मुट्ठी खोलकर देखी और उसने कहा कि मालूम होता है तूने किसी तरकीब से देख लिया।
अब मुट्ठी में हाथी होते नहीं। हो नहीं सकते। मगर मुट्ठी बंद हो, तो कुछ भी हो सकता है—कल्पना का जाल खुला है। तुमने कभी अपनी मुट्ठी खोलकर देखी, तुम्हारे पास है क्या?
मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, सब आपके चरणों में छोड़ते हैं। मैंने कहा, जरा रुको, यह है क्या? वह कहते हैं, नहीं, अब सभी छोड़ते हैं। मगर मैं. जरा हिसाब—किताब तो लगा लें कि है क्या? चिंता, बेचैनी, परेशानी, क्रोध, लोभ, माया, मोह, क्या छोड़ रहे हो? और ये छोड्कर कल ऐसा मत कहना कि देखो, हमने कितना आपके चरणों में छोड़ दिया। ये सब सांप—बिच्छू छोड़ रहे हो। कुछ और छोड़ने को है भी नहीं। और कल ऐसे घूमने लगोगे कि सब दान कर आए, सब छोड़ दिया, उनके चरणों में सब रख आए। रखने को क्या है? क्या छोड़ते हो?
अगर तुम थोड़ा होश से समझोगे, मुट्ठी खोलकर देखोगे, तो तुम चरणों में झुकोगे और कहोगे कि मेरे पास तो चरणों में रखने को कुछ भी नहीं है, अपने को खाली झुका रहा हूं। लेकिन मुश्किल से कभी कोई आदमी ऐसा कहता है कि अपने को खाली झुका रहा हूं। वह अपने सपनों को ही संपत्ति मान रहा है।
तो गीता, क्या था तेरे पास जिसको तू सोचती है कि खो गया? कुछ नहीं था। कुछ नहीं होने की अवस्था को समझा लेने के लिए कुछ सपने सजा रखे थे, मान रखा था कि ऐसा—ऐसा है, वे सपने टूट गए। वे टूट ही जाने चाहिए थे। इसलिए लगता है कि—
‘कभी—कभी ऐसा भी लगता है कि यहां आकर मैंने अपना जीवन गंवा दिया।’
जरूर, एक तरह का जीवन तूने गंवा दिया, पागलपन का जीवन तूने गंवा दिया। एक तरह का जीवन जो तेरे पिता जीए, पिता के पिता जीए, वह तूने गंवा दिया। लेकिन तेरे पिता ने क्या पाया, तुझे पता ? मरने के आखिरी दम तक संन्यास की हिम्मत न जुटा सके। आखिरी बार जब मुझे मिलने आए, मैंने उनसे कहा कि अब ज्यादा देर मत करो। तो उनको बात समझ में भी आयी, कहने लगे, हौ, शरीर भी कमजोर होता जाता है, लेना तो है संन्यास, मगर जरा ठहरें। अब उनको कुछ बाधा भी न थी संन्यास लेने में। जरा ठहरें! जरा ठहरे और एक सप्ताह के भीतर तो वे चले गए। अब ऐसा अवसर उन्हें दुबारा कभी आएगा, कब आएगा, कहना बहुत मुश्किल है!
अगर तू मुझसे पूछे गीता, तो तेरे पिता ने गंवाया, तूने कुछ नहीं गंवाया है। और जो भूल तेरे पिता ने की, उसके लिए वे पछता के जन्मों—जन्मों तक। क्योंकि वे आदमी खोजी थे, चाहते थे, मगर साहस न जुटा पाए। उतरने का मन था, लेकिन डावाडोल होते रहे। तूने हिम्मत की और डूब गयी। खोया कुछ भी नहीं है। या जो कुछ भी नहीं जैसा था वही खोया है। और जो तुझे मिला है, उसका तो तू अभी ठीक—ठीक मूल्यांकन भी नहीं कर सकती कि क्या मिला है। क्योंकि अभी तो प्रत्यभिज्ञा का उपाय भी तेरे पास नहीं है। धीरे—धीरे, धीरे—धीरे साफ होगा कि क्या मिला है।
यह तो ऐसे ही है कि जैसे एक फकीर को हम एकदम से साम्राज्य दे दें, तो उसकी समझ में ही न आएगा पहले कि क्या मिला। सिंहासन पर बिठा दें तो वह बड़ा बेचैन ही होगा कि मामला क्या है, यह क्या दरबार, यह क्या राजमहल, यह धन—दौलत, यह सब क्या है! क्या मिला है, उसको एकदम से समझ में ही नहीं आएगा। वक्त लगेगा हिसाब—किताब जोड़ने में, पहचान करने में, इस नयी परिस्थिति में डूबने में वक्त लगेगा।
जो माया का जगत था, उससे तेरे थोड़े हाथ छूटे, और जो सत्य का जगत है, उस तरफ थोड़ी जीवन की यात्रा आगे बढ़ी है। अब पीछे लौट—लौटकर मत देखो। जो गया, जाने दो। वह कुछ था ही नहीं, इसीलिए गया। जो अपना है, वह कभी जाता ही नहीं। इसे कसौटी समझो। जो वस्तुत: अपना है, उसे खोने का उपाय नहीं है, वह हमारा स्वभाव है। और जो खो जाए, वह अपना था ही नहीं। वह जितनी जल्दी खो गया उतना अच्छा, उतना कम समय व्यर्थ हुआ, प्रभु की अनुकंपा है। ऐसा मानकर, जो खोता हो उसे खो जाने देना और जो नया आता हो उसके स्वागत को तैयार रहना।

Friday, 9 October 2015

क्या सारी जिंदगी हारे ही हारे जीना होगा?
तुम पर निर्भर है। अगर जीत की बहुत आकांक्षा है तो हारे—हारे ही जीना होगा। अगर जीत की आकांक्षा छोड़ दो तो अभी जीत जाओ। फिर हार कैसी! हार का अर्थ ही होता है कि जीतने की बड़ी अदम्य वासना है। उसी वासना के कारण हार अनुभव में आती है। कभी खयाल किया, छोटा बच्चा अपने बाप से कुश्ती लड़ता है, बाप ऐसा थोड़ा दो—चार हाथ—पैर चलाकर जल्दी से लेट जाता है, छोटा बच्चा छाती पर बैठ जाता है और चिल्लाता है और प्रसन्नता से नाचता है कि गिराया, बाप को चारों खाने चित्त कर दिया। और बाप नीचे पड़ा प्रसन्न हो रहा है। चारों खाने चित्त होने में प्रसन्न हो रहा है, बात क्या है! क्योंकि बाप जानता है, हार स्वीकार की है उसने। तो हार में भी हार नहीं है।
लेकिन अगर कोई दूसरा आदमी तुम्हारी छाती पर चढ़ जाए, तो फिर जी
कचोटता है, हार हार मालूम होती है। हार इसीलिए मालूम होती है, क्योंकि तुम जीतना चाहते हो। अगर तुम हार को स्वीकार कर लो तो फिर हार कैसे मालूम होगी! तुम्हें अपमान इसीलिए तो अपमान मालूम होता है, क्योंकि तुम मान चाहते हो। अगर मान ही न चाहो तो अपमान कैसा!
इसे थोड़ा समझना! तुम्हें निर्धनता इसीलिए तो सालती है, खलती है, क्योंकि धन का पागलपन चढ़ा हुआ है। अगर धन का पागलपन न हो, तो निर्धनता क्यों सालेगी, क्यों खटकेगी? तुम्हें जो चीज अखरती हो, खयाल कर लेना, उससे उलटे की तुम्हारे भीतर चाह है। फिर तुम्हें अखरती ही रहेगी, फिर तुम्हारे पास कितना ही हो जाए!
अमरीका का बड़ा करोड़पति एंड्रू कारनेगी मरा तो दस अरब रुपए छोड्कर मरा, लेकिन मरते वक्त भी बेचैन था और परेशान था। और जब उसकी आत्मकथा लिखने वाले लेखक ने उससे दो दिन पहले पूछा, कि आप तो प्रसन्न मर रहे होंगे! क्योंकि आप दुनिया के सबसे बड़े धनी हैं, इतना नगद पैसा किसी के पास नहीं है जितना आपके पास है! एंड्रू कारनेगी ने कहा, कहां की बातें कर रहे हो? मैं असफल आदमी! मैं रोता हुआ मर रहा हूं। क्योंकि मैंने योजना बनायी थी सौ अरब रुपए इकट्ठे करने की और दस ही अरब कर पाया। यह भी कोई जीत है, नब्बे अरब की हार है।
अब तुम सोचो, अगर सौ की योजना हो तो स्वभावत: दस अरब रुपए कुछ नहीं मालूम पड़ते। नब्बे अरब की हार! और अगर तुमने कुछ भी न पाना चाहा हो तो दस पैसे भी बहुत मालूम पड़ते हैं कि दस पैसे मिल गए। चाहा तो तुमने यह भी नहीं था।
इसलिए फकीर छोटी —छोटी चीज से प्रसन्न हो जाता है। संन्यासी छोटी—छोटी चीज से प्रसन्न हो जाता है। मान ही नहीं पाता कि मेरी कोई योग्यता तो थी ही नहीं और इतना मिल गया! कोई कारण तो न था कि मिले और मिल गया। तो उसे प्रभु की अनुकंपा मालूम होती है, प्रसाद मालूम होता है।
और दूसरी तरफ संसारी है, कितना ही मिलता चला जाए, और उसकी रींगा —झींगी, उसका रोना— धोना बना रहता है! वह सिर पीटता ही रहता है। कुछ न कुछ कमी खलती ही रहती है—कुछ और चाहिए, कुछ और चाहिए। चाह का कोई अंत नहीं है। इसलिए तुम कितना ही पा लो, चाह सदा आगे छलांग लगा जाती है और रोना जारी रहता है।
तुम पूछते हो कि ‘क्या सारी जिंदगी हारे ही हारे जीना होगा?’
मैं तुमसे कहता हूं तुम पर निर्भर है। अगर जीतकर जीना है तो जीत की बात ही छोड़ दो। जीयो, जीत की बात ही छोड़ दो। इसी को तो समर्पण का जीवन कहते हैं। हार को स्वीकार कर लो। यहां जीत का मतलब ही क्या है! यहां कोई पराया है, जिससे जीतना है! यहां कोई दुश्मन है! यहां एक ही परमात्मा है, जीतना किससे है? उसके चरणों में सिर रख दो और तुम जीत गए। इसीलिए तो कहते हैं कि प्रेम में जो हार जाता है, वह जीत गया। प्रेम की हार जीत है।
तुम अहंकार की जीत पाना चाहते हो, हारोगे—हारते ही रहोगे, अहंकार की हर जीत से नयी हार निकलेगी। और प्रेम की हर हार नयी जीत का द्वार खोल देती है। इस विरोधाभास को समझना, यह जीवन का परम नियम है, क्योंकि यहां कोई पराया नहीं है। ये वृक्ष, ये चांद—तारे, ये लोग, ये पशु—पक्षी, ये सब तुम्हारे हैं, ये तुम हो, यह तुम्हारा ही फैलाव है। तुम इनके हो, ये तुम्हारे हैं, यहां अलग कौन है! यहां अलग— थलग होने का उपाय क्या है? किससे जीत रहे हो?
ऐसा समझो कि सागर की दो लहरें एक—दूसरे से कशमकश कर रही हैं, कुश्तम—कुश्ती कर रही हैं कि जीतना है और किसी को पता नहीं, दोनों को खयाल नहीं कि हम एक ही सागर की लहरें हैं, जीतना किससे?
समझो कि मेरे बाएं और दाएं हाथ कुश्ती करने लगें —चाहो तो करवा सकते हो कुश्ती दोनों हाथों की, क्या अड़चन है, लड़ा दो! और तब मुश्किल खड़ी हो सकती है कि कौन जीते, कौन हारे! फिर तुम्हारी मर्जी, चाहे बाएं को जिता लो, चाहे दाएं को जिता लो। मगर दोनों हालत में बात फिजूल थी। दोनों हाथ तुम्हारे, कैसी हार, कैसी जीत! यहां दूसरा नहीं है, दूजा नहीं है।
इस अनुभव का नाम ही समर्पण है कि यहां कोई दूसरा नहीं है, हम ही हैं। तो न अब कोई हार है, अब न कोई जीत है।
तुम पर निर्भर है। समर्पण जिसने किया, वह जीत गया। जो हारा, वह जीत गया।
इस तरह तो दर्द घट सकता नहीं
इस तरह तो वक्त कट सकता नहीं
आस्तीनों से न आंसू पोंछिए
और ही तदबीर कोई सोचिए
यह अकेलापन अंधेरा यह उदासी यह घुटन
द्वार तो हैं बंद, भीतर किस तरह झांके किरन
बंद दरवाजे जरा से खोलिए
रोशनी के साथ हंसिए, बोलिए
मौन पीले पात सा झर जाएगा
तो हृदय का घाव खुद भर जाएगा
एक सीढी है हृदय में भी महज घर में नहीं
सर्जना के दूत आते हैं सभी होकर वहीं
ये अहं की श्रृंखलाएं तोड़िए
और कुछ नाता गली से जोडिए
जब सड़क का शोर भीतर आएगा
तब अकेलापन स्वयं मर जाएगा
आइए कुछ रोज कोलाहल भरा जीवन जिएं
अंजुरी भर दूसरों के दर्द का अमृत पिएं
आइए बाल अफवाहें सुनें
फिर अनागत के नए सपने बुने
यह स्लेटी कोहरा छंट जाएगा
तो हृदय का दर्द खुद घट जाएगा
तुमने अपने को अकेला मान रखा है, अलग मान रखा है, इससे तुम पीड़ित हो।
आइए कुछ रोज कोलाहल भरा जीवन जिएं
क्या मतलब? मतलब कि थोड़ी देर को इस विराट से अपने को जोडे, इन पक्षियों की चहचहाहट से जोड़े, इन वृक्षों के फूलों से जोडे, इन चांद—तारों की किरणों से जोड़े।
बंद दरवाजे जरा से खोलिए
रोशनी के साथ हंसिए, बोलिए
थोड़ा जुडिए। ऐसे अलग— थलग छोटे से द्वीप बनकर मत रह जाइए, महाद्वीपँ’ बनिए। थोड़ा जोडिए अपने को। एक क्षण तो अलग जी सकते नहीं, फिर अलग होने का मतलब क्या है?
श्वास तो प्रतिपल चाहिए न बाहर से, भोजन तो प्रतिदिन चाहिए न बाहर से, जल तो प्रतिदिन चाहिए न बाहर से! जो अभी बाहर था अभी भीतर हो जाता है, फिर भीतर था, फिर बाहर हो जाता है। बाहर— भीतर, बाहर— भीतर, लेन—देन पूरे समय चल रहा है। एक क्षण को तुम बाहर से टूटकर जी कैसे सकते हो? इसलिए न कुछ भीतर, न कुछ बाहर।
एक सीढ़ी है हृदय में भी महज घर में नहीं
सर्जना के दूत आते हैं सभी होकर वहीं
जरा भीतर झांकिए, एक सीढ़ी है, जहा से हम परमात्मा से जुड़े हैं, विराट से जुड़े हैं।
यह अकेलापन अंधेरा यह उदासी यह घुटन
द्वार तो हैं बंद, भीतर किस तरह झांके किरन
नहीं!
इस तरह तो दर्द घट सकता नहीं
इस तरह तो वक्त कट सकता नहीं
आस्तीनों से न आंसू पोंछिए
और ही तदबीर कोई सोचिए
क्या तदबीर करें कि जीवन हार—हार का न रह जाए? हार जाओ, फिर कोई हार नहीं। यही तदबीर है। मिट जाओ, फिर तुम्हें कोई न मिटा सकेगा, मौत भी न मिटा सकेगी। अहंकार को जाने दो। फिर तुम्हें मिटाने की सामर्थ्य किसी में भी नहीं, न कोई हराने की सामर्थ्य किसी में है।
यह अहंकार ही अपमान करवाता है, यह अहंकार ही असफलता लाता है, यह अहंकार ही हराता है, यह अहंकार हजार जहर के घूंट पिलाता है, फिर भी तुम अमृत समझकर पीए जा रहे हो, तो हारोगे, तो रोओगे, तो तुम्हारा सारा जीवन आंसुओ की एक लंबी श्रृंखला हो जाएगी।
यह श्रृंखला फूलों में बदल सकती है। जरा सा रुख बदलिए। जरा द्वार खोलिए। जरा जुडिए, मिलिए। जरा देखिए कि सब एक है। इस उदघोषणा का नाम ही वेदांत है। इस उदघोषणा का नाम ही धर्म है। इस उदघोषणा का नाम ही बुद्धत्व है।

Thursday, 8 October 2015

मेरी शरण आना तो बहुत सरल है, क्योंकि तुम मेरे लगाव में पड़े हो, तुम मेरे प्रेम में पड़े हो, तुम दीवाने हो, तो झुक गए। दीक्षा से तुम्हारा कोई ऐसा लगाव नहीं, ऐसा कोई दीवानापन नहीं, दीक्षा तो लगती ठीक तुम जैसी है, लेकिन अर्थ समझना। जब तक तुम तुम जैसों के शरण में नहीं जाओगे, तब तक तुमने अभी तक अपने को समझा ही नहीं। क्योंकि जो तुम जैसा है, वह तुम्हें आदर योग्य नहीं मालूम होता, इसका अर्थ क्या हुआ? इसका अर्थ हुआ कि तुम स्वयं ही अभी अपनी आंखों में आदर योग्य नहीं हो। जब तुम कहते हो कि अपने ही जैसे की शरण जाएं, तो तुम क्या कह रहे हो, तुमने शायद सोचा नहीं। तुम यह कह रहे हो कि मैं तो निंदित, पापी, अपराधी, और मेरे ही जैसे किसी की शरण जाऊं! तो तुम्हारे मन में बड़ी आत्मग्लानि है। तुम्हारे मन में बडा आत्म—तिरस्कार है। अपमान है अपना।
और जिसके मन में अपने प्रति अपमान है, वह कैसे आत्मवान हो सकेगा’? जो अपनी निंदा कर रहा है, जो अभी अपना सम्मान भी नहीं सीख सका, वह अपने भीतर कैसे प्रवेश कर सकेगा? जो अभी अपने को प्रेम भी नहीं कर सकता, वह किसको प्रेम कर सकेगा? कहने वाला तो यही कह रहा है कि शायद वह दीक्षा का असम्मान कर रहा है यह कहकर कि वह तो मेरे ही जैसी है, उसकी क्या शरण जाना!
लेकिन वह अपना ही अपमान कर रहा है। वह घोषणा कर रहा है कि मैं दो कौड़ी का, और दीक्षा मेरे जैसी, तो मैं कैसे शरण जाऊं?
जिस दिन तुम अपने ही जैसों की शरण जाने लगोगे, उस दिन तुम्हारे जीवन में आत्म—गौरव आएगा। यह बात तुम्हें बड़ी विरोधाभासी लगेगी कि जिस दिन व्यक्ति समस्त के चरणों में झुक जाता है, उस दिन वह आत्म—गौरव को उपलब्ध हो गया। उसने कहा कि निम्नतम के भी शरण में मैं झुक जाता हूं पत्थर के शरण झुक जाता हूं क्योंकि अस्तित्व महिमावान है, निम्न यहां कोई हो ही कैसे सकता है! उस दिन उसे अपने भीतर की गरिमा का बोध होगा।
तो बुद्ध की शरण जाना तो बड़ा सरल है। सरल से शुरू करो मगर सरल पर अटके मत रह जाना। इसलिए संघं शरणं गच्छामि। संघ का मतलब, दीक्षा, लक्ष्मी, मैत्रेय, इनकी शरण जाओ, कभी—कभी अपनी ही शरण. जाओ, कभी—कभी अपने ही पैर छू लो। क्योंकि तुम्हारे भीतर भी परमात्मा विराजमान है। लगेगा पागलपन, पहले तो दूसरे के पैर छूने में बड़ा पागलपन लगता है, फिर अपने पैर छूने में तो निश्चित ही पागलपन लगेगा। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं, कभी—कभी अपने भी पैर छुओ। तुम्हारे भीतर भी परमात्मा ही विराजमान है—उतना ही जितना मेरे भीतर, उतना ही जितना बुद्ध के भीतर, उतना ही जितना महावीर के भीतर।
ऐसा हुआ एक बार, रामकृष्ण की किसी ने तस्वीर उतारी। वह तस्वीर लेकर आया तो रामकृष्ण ने झुककर उस तस्वीर के चरण छुए। खुद की तस्वीर! शिष्य जरा बेचैन हुए, उन्होंने कहा कि लोग पागल तो समझते ही हैं इन्हें, अब और बिलकुल पागल समझेंगे, यह हद्द हो गयी। किसी ने जरा टेहुनी मारी कि परमहंसदेव, क्या कर रहे? खबर हो गयी लोगों को तो, लोग पागल मानते ही हैं, अब हद्द हो जाएगी कि अब अपनी ही तस्वीर के पैर छूने लगे। तो उन्होंने कहा कि मेरी तस्वीर! मेरी तस्वीर तो हो कैसे सकती है! क्योंकि मैं तो देह नहीं हूं। लेकिन यह जो तस्वीर है, बड़ी समाधि की है। जिसकी भी ली गयी हो यह तस्वीर, यह आदमी बड़ी समाधि में रहा होगा! तो मैं तो समाधि को झुक रहा हूं। अब इससे क्या फर्क पड़ता है कि मैं ही समाधि में था कि कोई और समाधि में था। समाधि में कहां मैं, कहां तू? समाधि तो समाधि है।
कभी अपने पैर भी छूना, और तुम अपूर्व पुलक का अनुभव करोगे। कभी अपने जैसों के भी पैर छूना। अपने से बड़ों के पैर छूने में तो अहंकार गिरता नहीं। कैसे गिरेगा? जिसको तुम अपने से बड़ा मानते हो, उसके पैर छूने में कैसे अहंकार गिरेगा? जिसको तुम अपने जैसा मानते हो, या अपने से छोटा मानते हो, उसके पैर छूने में अहंकार गिरेगा।
मगर स्वाभाविक है, पहले तो यात्रा वहां से करनी होती है जो सुगम हो। इसलिए बुद्धं शरणं गच्छामि। पहले अपने से विराट के चरण छू लो। फिर संघं शरणं गच्छामि। फिर संघ में तो सब तरह के लोग होंगे, कोई तुम जैसा होगा, कोई तुमसे अच्छा होगा, कोई तुमसे गया—बीता होगा। संघ की शरण जाने का अर्थ है, अब मैं हिसाब नहीं रखता कि कौन बड़ा, कौन छोटा, कौन ऊपर, कौन नीचे, अब तो जो भी सत्य की खोज कर रहे हैं, सब की शरण जाता हूं।
और तीसरा, धम्मं शरणं। लेकिन संघ की शरण में भी सीमा है। अगर बुद्ध के मानने वाले बौद्ध भिक्षुओं की शरण जाते हैं, तो वे जैन भिक्षुओं की शरण तो न जाएंगे, हिंदू संन्यासियों की शरण तो न जाएंगे, मुसलमान फकीरों की शरण तो न जाएंगे, ईसाइयों की शरण तो न जाएंगे। सीमा है। और जहा सीमा है, वहा अभी हम परमात्मा से दूर हैं। इसलिए आखिरी कदम उठाया जाता है, सीमा तोड़ दी जाती है —धम्मं शरणं गच्छामि। अब कौन हिंदू कौन मुसलमान, कौन ईसाई, कौन सिख, कौन जैन, कुछ भेद न रहा। हिंदू मुसलमान, ईसाई की तो बात ही छोड़ो; पौधे, पशु, पक्षी, पत्थर, पहाड़, चांद—तारे, सबके भीतर जो एक ही सत्य समाया हुआ है, हम उसकी शरण जाते हैं।
ऐसे ये त्रि—रत्‍न हैं। ये बड़े बहुमूल्य हैं। इनका अर्थ समझोगे, तो इनके द्वारा कुंजी मिल सकती है।

Wednesday, 7 October 2015

 प्रतिबिंबों के सहारे सत्य खोजा जा सकता है, अगर तुम प्रतिबिंबों के विपरीत चलो। इसीलिए तो धन इकट्ठा करने से शायद सत्य के मिलने का उतना संबंध नहीं जुड़ता, जितना धन को दान कर देने से जुड़ता है। यह विपरीत चलना हुआ। साधारण मन तो कहता है, धन इकट्ठा करो। असाधारण मन कहता है, दान कर दो, मौत तो ले ही लेगी, छीन ही लेगी। इसके पहले कि छीन ले, लुटा दो। जो छिन ही जाएगा, उसको लुटाने का मजा तो कम से
कम ले लो। जो मौत ले ही जाएगी..।
एक अमरीका का बहुत बड़ा करोड़पति मरने के करीब था, तो उसका परिवार सब इकट्ठा हो गया। उसका वकील आया और उसने कहा, आप अपनी वसीयत करवा दें। तो उस करोड़पति ने आंख खोली और एक ही लाइन बोला, उसने कहा, वसीयत में लिखो कि मैं होशियार आदमी था, जो भी मैंने कमाया सब लुटा दिया। अब वसीयत में मेरे पास करने को कुछ है नहीं। जिस तरह मैंने कमाया, मेरे बच्चे भी उसी तरह कमाएं और जिस तरह मैंने लुटाया, उसी तरह मेरे बच्चे भी लुटा दें। मैं इतना नासमझ न था कि इकट्ठा करके और दूसरों के लिए छोड़ जाऊं। जब छोड़। जाना था तो मैंने लुटा दिया।
धन के संग्रह से शायद सत्य की झलक उतनी नहीं मिलती, जितना धन के त्याग से मिल जाती है। पद की पकड़ से शायद सत्य की उतनी झलक नहीं मिलती, जितना पद के त्याग से मिल जाती है।
इसलिए तो महावीर और बुद्ध सड़क के भिखारी हो गए, सिंहासन छोड़ दिया। तुम्‍हारे हिसाब से तो नासमझ ही थे। सिंहासन मिलता कहां ! कितनी मुश्किल से मिलता है! मिला—मिलाया छोड़ दिया। पागल रहे होंगे। लेकिन छोड्कर कुछ और पाया जो बड़ा था, उलटे चले। आदमी का मन भीड़— भाड़ में जाने का होता है, जो एकांत में चला जाता है, उसको मिलता। आदमी का मन तो होता है— भीड़— भाड़, अकेले में तो मन भांय—भांय करता है, घबड़ाहट होती है। अकेले बैठे नहीं कि चैन नहीं पड़ता है—कहा जाएं, कहां न जाएं? क्या करें, क्या न करें? किससे मिलें, किसको बुला लें? कोई तो चाहिए। मित्र न मिले तो दुश्मन सही, मगर कोई तो चाहिए। अकेले? अकेले में तो बड़ी घबड़ाहट होती है।
तो मनुष्य का मन तो भीड़ की तरफ जाता है। भीड़ में तुम परमात्मा को न पा सकोगे। भीड़ तो प्रतिबिंब देगी। भीड़ के विपरीत। इसलिए जिन्होंने शान को खोजा वे जंगल चले गए, पहाड़ चले गए, दूर एकांत में गुफाओं में बैठ गए। वे प्रतीक हैं इस बात के कि उलटे जा रहे हैं।
बुझा—बुझा मन
थका— थका तन
भटका हूं मैं कहां—कहां
किसने दी आवाज मुझे
मैं खिंचा चला आया पीछे
जैसे डोर किसी बंसी की
मछली को ऊपर खींचे
यह अबूझ बेनाम उदासी
यह तन से निर्वासित मन
यह संदर्भहीन पीड़ाएं
दर्पन में प्रतिबिंबित दर्पन
किसी हृदय में किसी नजर में
खटका हूं मैं कहा—कहा
कितना विस्मय है
अपने में ही सीमित रह जाने में
जैसे दीया लिए हाथों में
उतर रहा तहखाने में
नंगे पांव झुलसते मरुथल में
निर्झर का अन्वेषण आह,
सृजन से पूर्व
मनःस्थितियों के दुर्निवार ये क्षण
कभी भाव पर
कभी बिंब पर
अटका हूं मैं कहां—कहां
बुझा—बुझा मन
थका— थका तन
भटका हूं मैं कहां —कहा
हमारी सारी भटकन क्या है? हमारी भटकन यही है कि जो है उसे न खोजकर हम उसकी छाया खोज रहे हैं।
इसीलिए तो इस देश में ज्ञानियों ने संसार को माया कहा है। माया का अर्थ है, जो नहीं है और प्रतीत होता है कि है। झील में दिखने वाला चांद है या नहीं है? अगर तुमसे कोई पूछे कि ही और न में जवाब दो, क्या करोगे? अगर वह कहे, ही और न में जवाब दो, ज्यादा बातचीत हम चाहते नहीं। झील में दिखायी पड़ने वाला नाद है या नहीं? तो क्या तुम कहोगे, है? या तुम कहोगे, नहीं? तुम कहोगे, भाई, है और नहीं में तो उत्तर नहीं हो सकता। ही और न में उत्तर नहीं हो सकता, थोड़ी सुविधा दो मुझे बोलने की। है भी और नहीं भी है। है भी, क्योंकि साफ दिखायी पड़ रहा है कि है। और मुझे पता है कि जब नहीं होता तब झील अलग ढंग की होती है। इसलिए है तो। और है भी नहीं, क्योंकि उतरकर बहुत बार देखा, कुछ पाया नहीं। तो माया है।
माया बड़ा अदभुत शब्द है। माया का अर्थ यह नहीं होता कि जो नहीं है, माया का अर्थ होता है, जो नहीं है और फिर भी है जैसा भासता है। जो है और फिर भी नहीं है। दोनों के मध्य में है माया—होने और न होने के। परमात्मा है और माया
उसका प्रतिबिंब है। सिर्फ छाया है।
इसलिए जब तुम भीड़— भाड़ में भागकर, धन—पद—प्रतिष्ठा की दौड़ को दौड़कर पाक जाओगे और अपने भीतर उतरने लगोगे, अपने स्यात में उतरोगे, उलटे चलोगे —
कितना विस्मय है
अपने में ही सीमित रह जाने में
तब तुम निश्चित विस्मय से भर जाओगे, अपूर्व आनंद से।
कितना विस्मय है
अपने में ही सीमित रह जाने में
जैसे दीया लिए हाथों में.
उतर रहा तहखाने में
जैसे कोई दीया लेकर अपने ही भीतर के तहखाने में उतर रहा! उस दीण्र का नाम, बोध, उस दीए का नाम, ध्यान। उस ध्यान के दीए को लेकर जब कोई अपने ही भीतर के तहखाने में उतरता है, तब मिलन होता है उससे, जो है। तब शरद पूर्णिमा , ते चंद्रमा से मिलन होता है।
कभी भाव पर
कभी बिंब पर
अटका हूं मैं कहां —कहां
बुझा —बुझा मन
थका— थका तन
भटकन हूं मैं कहा—कहा
यात्रा को उलटाओ। संन्यास और संसार विपरीत यात्राएं। संसार का अर्थ होता ओ?ए?, धन पर पकड; संन्यास का अर्थ होता है—छोड़ना, पकड़ छोड़ना। संसार का —भर्थ होता है, मेरा —तेरा, बहुत आग्रह से। संन्यास का अर्थ होता है, कौन मेरा, कौन तैरा! न कोई मेरा, न कोई तेरा। संसार का अर्थ होता है, क्षुद्र को इकट्ठा करते रही, घर को बना लो कबाड़खाना, उसी कबाड़खाने में डूबो और मर जाओ। संन्यास का अर्थ होता है, सार को गहो, असार को छोड़ो। आम—आम चूस लो, गुठली—गुठली फेंक दो। संसार का अर्थ होता है, गुठलियां इकट्ठी करते रहो, आम चूसने की तो फुर्सत कहां है! गुठर्लियां इकट्ठी करते रहो और फिर सिर मारो और तडूफो और कहो कि —
थका— थका तन
बुझा—बुझा मन
भटका हूं मैं कहा —कहां
और गुठलियां इकट्ठी कर ली हैं। और हर गुठली के साथ रस भी था। क्योंकि हर माया के साथ ब्रह्म जुड़ा है। और हर प्रतिबिंब का मूल है। मगर तुम उलटे चले गए
जीने की प्रतिक्रिया में
मिट रहे हैं
जुड़ने की प्रतिक्रिया में
कट रहे हैं
क्यों न अब उलटे चलें हम
मिटें,
ताकि जी सकें हम
कटे,
ताकि जुड़ सकें हम
इस उलटी यात्रा को ही जिसने समझ लिया, वह सत्य से ज्यादा दूर न रह सकेगा। आंख तुमने हटा ली झील में बनते हुए प्रतिबिंब से, तो तत्‍क्षण तुम्हारी आंख आकाश में दौड़ते चांद को पकड़ लेगी। देर नहीं लगेगी। और आकाश का चांद कितना ही दूर हो, झील के चांद से पास है।
देखते नहीं, आदमी आकाश के चांद पर पहुंच गया। आदमी चल लिया आकाश के चांद पर। झील के चांद पर आदमी कभी नहीं पहुंच सकेगा। क्योंकि जो है ही नहीं 1 भासता मात्र है, उस पर कैसे चलोगे?