Friday, 22 May 2015

जिंदगी ही जब बिना पूछे बीत जाती हो तो आश्चर्य नहीं होगा कि आपमें से बहुत लोग बिना पूछे यहां आ गए हों कि क्यों जा रहे हैं। शायद कुछ लोग जानकर आए हों, संभावना बहुत कम है। हम सब ऐसी मूर्च्छा में चलते हैं, ऐसी मूर्च्छा में सुनते हैं, ऐसी मूर्च्छा में देखते हैं कि न तो हमें वह दिखाई पड़ता जो है, न वह सुनाई पड़ता जो कहा जाता है, और न उसका स्पर्श अनुभव हो पाता जो सब ओर से बाहर और भीतर हमें घेरे हुए है।
मूर्च्छा में ही यहां भी आ गए होंगे। शात भी नहीं है; हमारे कदमों का भी हमें कुछ पता नहीं है; हमारी श्वासों का भी हमें कुछ पता नहीं है। लेकिन मैं क्यों आया हूं यह मुझे जरूर पता है; वह मैं आपसे कहना चाहूंगा।
बहुत जन्मों से खोज चलती है आदमी की। न मालूम कितने जन्मों की खोज के बाद उसकी झलक मिलती है— जिसे हम आनंद कहें, शांति कहें, सत्य कहें, परमात्मा कहें, मोक्ष कहें, निर्वाण कहें—जो भी शब्द ठीक मालूम पड़े, कहें। ऐसे कोई भी शब्द उसे कहने में ठीक नहीं हैं, समर्थ नहीं हैं। जन्मों—जन्मों के बाद उसका मिलना होता है।
और जो लोग भी उसे खोजते हैं, वे सोचते हैं, पाकर विश्राम मिल जाएगा। लेकिन जिन्हें भी वह मिलता है, मिलकर पता चलता है कि एक नये श्रम की शुरुआत है, विश्राम नहीं। कल तक पाने के लिए दौड़ थी और फिर बांटने के लिए दौड़ शुरू हो जाती है। अन्यथा बुद्ध हमारे द्वार पर आकर खड़े न हों, और न महावीर हमारी सांकल को खटखटाए, और न जीसस हमें पुकारें। उसे पा लेने के बाद एक नया श्रम।
सच यह है कि जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है, उसे पाने में जितना आनंद है, उससे अनंत गुना आनंद उसे बांटने में है। जो उसे पा लेता है, फिर वह उसे बांटने को वैसे ही व्याकुल हो जाता है, जैसे कोई फूल खिलता है और सुगंध लुटती है, कोई बादल आता है और बरसता है, या सागर की कोई लहर आती है और तटों से टकराती है। ठीक ऐसे ही, जब कुछ मिलता है तो बंटने के लिए, बिखरने के लिए, फैलने के लिए प्राण आतुर हो जाते हैं।
मेरा मुझे पता है कि मैं यहां क्यों आया हूं। और अगर मेरा और आपका कहीं मिलन हो जाए, और जिस लिए मैं आया हूं अगर उस लिए ही आपका भी आना हुआ हो, तो हमारी यह मौजूदगी सार्थक हो सकती है। अन्यथा अक्सर ऐसा होता है, हम पास से गुजरते हैं, लेकिन मिल नहीं पाते। अब मैं जिस लिए आया हूं अगर उसी लिए आप नहीं आए हैं, तो हम पास होंगे, निकट रहेंगे, लेकिन मिल नहीं पाएंगे।

Thursday, 21 May 2015

रमात्मा के साक्षात्कार में, उसकी पूर्ण स्वीकृति में, स्वयं को पूरा खोने की तैयारी चाहिए। परमात्मा का अनुभव अपनी पूर्ण मृत्यु का अनुभव है। जो मिटने को राजी है, वही उसे पूरी तरह स्वीकार कर पाता है। अगर मिटने में जरा—सा भी संकोच है, तो अस्वीकार शुरू हो जाता है और भय भी।
भय एक ही है कि कहीं मैं मिट न जाऊं। और यह भय अंतिम बाधा है। इसलिए जो जानते रहे हैं, उन्होंने कहा है, जैसे जीसस ने, कि जो अपने को बचाएगा, वह खो देगा। और जो अपने को खोने को तैयार है, वह प्रभु को पा लेगा। अपने को बचाना ही धर्म के मार्ग पर पाप है। अपने को बचाने की चेष्टा ही एकमात्र रुकावट है।
तो अर्जुन सामने खड़ा है; विराट के द्वार खुल गए हैं। लेकिन कहीं मैं मिट न जाऊं— इसकी वह बात कर नहीं रहा है, यह भी समझ लेने जैसा है। वह कह रहा है कि आपके दांतों में दबे हुए, पिसते हुए द्रोण को देखता हूं भीष्म को देखता हूं कर्ण को देखता हूं। आपका मुंह मृत्यु, महाकाल बन गया है। आपके मुंह से लपटें निकल रही हैं और विनाश की लीला हो रही है। और मैं बड़े—बड़े योद्धाओं को भी इस विनाश के मुंह की तरफ भागते हुए देखता हूं जैसे पतंगे दीप—शिखा की तरफ भागते हों, अपनी ही मौत की तरफ। कहीं भी वह अपनी बात नहीं कह रहा है।
लेकिन ध्यान रहे, जब भी कोई दूसरा मरता है, तो हमें अपने मरने की खबर मिलती है। और जब भी कहीं मृत्यु घटित होती है, तो किसी एक अर्थ में तत्काल हमें चोट भी लगती है कि मैं भी मरूंगा।
जब अर्जुन यह देख रहा होगा सबको मिटते हुए कृष्‍ण के मुंह में, तो यह असंभव है कि यह छाया की तरह चारों तरफ यह बात उसको न घेर ली हो कि मैं भी मिटूगा, मैं भी ऐसे ही मरूंगा। और मैं भी पतंगे की तरह किसी ज्योति में जलने को इसी तरह भागा जा रहा हूं जैसे यह सारा लोक। मैं भी इस लोक से अलग नहीं हूं। वह कह तो दूसरों की बात रहा है, लेकिन उसमें खुद स्वयं की बात भी गहरे में सम्मिलित है। वह भय पकड़ता है।
बुद्ध अपने साधकों को कहते थे, इसके पहले कि तुम परम सत्य को जानने जाओ, तुम ऐसे हो जाओ जैसे मर गए हो, जीते जी मृत। अगर तुम जीते जी मृत नहीं हो गए हो, तो उस परम सत्य को तुम न झेल पाओगे। जो जीते जी मृत हो गया है, उसे फिर कोई भी भय नहीं है। फिर परमात्मा के सामने खड़े होकर मिटने की उसकी पहले से ही तैयारी है। यह तैयारी न हो, तो अड़चन होगी।
और जो लोग भी परमात्मा की खोज में जाते हैं, वे जीवन की खोज में जाते हैं, मृत्यु की खोज में नहीं। जो जीवन के पिपासु हैं अभी, वे उसे न पा सकेंगे। जो मिटने को राजी हैं, वे उसे पा लेंगे, परम जीवन भी उन्हें मिलेगा। लेकिन परम जीवन मिलता है पूर्ण मृत्यु की स्वीकृति से।
अपने को मिटाने को जो तैयार है, उसे इस जगत में फिर कोई भी नहीं मिटा सकता। और अपने को बचाने को जो पागल है, वह मिटेगा ही। क्योंकि जो हमारे भीतर भयभीत है कि मिट न जाऊं, वह है अहंकार। वह मिटेगा ही, वह बनाई हुई चीज है। जो बनाई हुई चीज है, वह मिटती ही है।
हमारे भीतर जो मृत्यु से भी नहीं मिटती, वह है आत्मा। और जब तक हमें मृत्यु का भय है, उसका अर्थ हुआ कि हमें आत्मा का कोई भी पता नहीं। हमें सिर्फ अपने अहंकार का, अस्मिता का, मैं भाव का पता है। हमारे भीतर मरणधर्मा है अहंकार, और अमृत है आत्मा। हम सबको अपने मैं का पता है, आत्मा का कोई पता नहीं है।
इस मैं को ही हम लिए जाते हैं परमात्मा के द्वार पर भी। यह भीतर प्रवेश न कर सकेगा। इसे मिटना होगा, इसे बाहर दरवाजे पर ही छोड़ना होगा।
अर्जुन का भय भी उन सभी साधकों का भय है, जो आखिरी किनारे पर खड़े हो जाते हैं और जहां सवाल उठता है कि क्या अब मैं अपने को खोने को राजी हूं?
हम परमात्मा को भी पाना चाहते हैं अपने में जोड्ने को, ध्यान रखना। वह भी हमारी संपत्ति हो। वह भी हमारी मुट्ठी में हो। वह भी हमारे बैंक बैलेंस में लिखा हो, कि इस आदमी को भगवान मिल गया! वह भी हमारे हाथ में हो। हमारा अहंकार उसके होने से और प्रगाढ़ होता हो, कि मैंने परमात्मा को पा लिया। इसलिए हम उसकी भी खोज करते हैं।
और धर्म बड़ी उलटी व्यवस्था है। धर्म कहता है, जब तक तुम हो, तब तक तुम उसे न पा सकोगे।
कबीर ने कहा है, जब तक मैं था, खोज—खोज कर, परेशान हो— हो कर मिट गया, उसे न पाया। और जब मैं मिट गया, तो मैंने देखा कि वह सामने खड़ा हुआ है! वह दूर नहीं था। मैं था, इसीलिए दूर था। मेरा होना ही एकमात्र अड़चन, बाधा, अवरोध है।
अर्जुन भी उसी अंतिम, आखिरी…। शानियों ने कहा है, अहंकार अंतिम बाधा है। सब छूट जाता है। धन छोड़ना आसान है। परिवार छोड़ना आसान है। शरीर छोड़ना आसान है। अहंकार छोड़ना सबसे कठिन है कि मैं हूं। और जब तक मैं हूं, तब तक मैं हूं केंद्र। और अगर परमात्मा भी सामने खड़ा हो, तो वह भी नंबर दो है। जब तक मैं हूं, तब तक वह भी नंबर दो है, नंबर एक तो मैं ही हूं! और जब तक परमात्मा को नंबर एक पर रखने की तैयारी न हो, तब तक बाधा रहेगी। जिस क्षण मैं कह सकता हूं कि अब तू ही है, अब मैं नहीं हूं —..।

Wednesday, 20 May 2015

आकार क्‍या है? कैसे हम आकार कहते हैं? इस जगत में कुछ भी है जो साकार है?
इस जगत में सभी कुछ निराकार है। लेकिन हमारे पास देखने वाली आंखें सीमित हैं। इसलिए निराकार भी हमें आकार ही दिखाई पड़ता है। आप अपनी खिड़की से आकाश को देखते हैं, तो खिड़की के बराबर चौखटे में ही आकाश दिखाई पड़ता है। आप अपने नीले चश्मे से जगत को देखते हैं, तो जगत नीला दिखाई पड़ता है। आपकी देखने की क्षमता के कारण आकार निर्मित होता है, अन्यथा आकार कहीं भी नहीं है।
आप कहेंगे, यह तो बात कुछ जंचती नहीं। हमारे शरीर का तो कम से कम आकार है!
वहां भी आकार नहीं है। कहां आपका शरीर समाप्त होता है, आपको पता है? अगर सूरज ठंडा हो जाए—दस करोड़ मील दूर है— अगर ठंडा हो जाए, तो आपके शरीर का आपको पता है क्या होगा? उसी वक्त ठंडा हो जाएगा। तो आपका शरीर आपकी चमड़ी पर नहीं समाप्त होता। वह दस करोड़ मील दूर जो सूरज है, वह भी आपके शरीर का हिस्सा है। क्योंकि उसके बिना आप जी नहीं सकते। वह जो दस करोड़ मील दूर सूरज है, वह भी आपके शरीर का हिस्सा है, क्योंकि आपका शरीर उसके बिना जी नहीं सकता। शरीर जुड़ा है उससे।
कहां आपका शरीर खत्म होता है? आपके ऊपर? अगर आपके पिता न होते, तो आप हो सकते थे?
पीछे लौटें! तब आपको पता चलेगा, अरबों—खरबों वर्षों का जो इतिहास है, उससे आपका शरीर निर्मित हुआ है। करोड़ों—करोड़ों वर्ष से जीवाणु चल रहा है, वह आपका शरीर बना है। अगर उस श्रृंखला में एक जीवाणु अलग हो जाए, तो आप नहीं होंगे। तो समय में पूरा इतिहास आपमें समाया हुआ है। अभी इस क्षण सारा जगत आपमें समाया हुआ है। अगर इस जगत में जरा भी फर्क हो जाए, आप नहीं होंगे।
तो आपका शरीर अनंत—अनंत शक्तियों का एक मेल है। आपको जितना दिखाई पड़ता है, उसको आप शरीर मान लेते हैं। और अगर यह सच है कि अनंत इतिहास आपमें समाया हुआ है, तो अनंत भविष्य भी आपमें समाया हुआ है। वह आपसे ही पैदा होगा।
आप कहां शुरू होते हैं? कहां समाप्त होते हैं? आपने अपने जन्म—दिन को अपना जन्म—दिन समझ लिया है, यह आपकी समझ की सीमा है। कब आप पैदा हुए? आपका जीवाणु चल रहा है अरबों—अरबों, खरबों वर्षों से। जब आप पैदा नहीं हुए थे, तब वह आपकी मां में था, आपके पिता में था। और जब आपके मां—बाप भी पैदा नहीं हुए थे, तब वह किसी और में था। लेकिन वह चल रहा है। आप थे अनंत काल से। और आप जब नहीं होंगे, तब भी वह चलता रहेगा अनंत काल तक।
कहां आपका शरीर समाप्त होता है? कहां शुरू होता है? कहां है सीमा उसकी? अभी इस क्षण में भी कहां है उसकी सीमा? किस जगह हम मानें कि यहां मेरा शरीर समाप्त हुआ? सूरज को हम अपने शरीर का हिस्सा मानें या न मानें? यह बडा सवाल है। वैज्ञानिक पूछते हैं कि इसमें कहां हम समाप्त करें शरीर को?
हमने पत्थर की भी मूर्तियां बनाईं। जिन्होंने पत्थर की मूर्तियां बनाईं, बड़े होशियार लोग थे। क्योंकि उन्हें एक दफा दिखाई पड़ गया, तो फिर पत्थर में भी दिखाई पड़ने लगा। एक दफा दिखाई पड़ जाए, तो कहीं भी दिखाई पड़ेगा। फिर पत्थर में भी वही दिखाई पड़ेगा। फिर कोई कारण नहीं है। फिर कहीं कोई बाधा नहीं है। फिर कोई रुकावट रोक नहीं सकती। जो मुझे दिख गया एक दफा, वह फिर मैं कहीं भी देख लूंगा।
लेकिन देखने के लिए बड़ी बात यह नहीं है कि राम भगवान हैं या नहीं। यह बड़ा सवाल नहीं है। यह असंगत है। बड़ा सवाल यह है कि मेरे पास भगवान को देखने की आंख है या नहीं!
बुद्ध के पिछले जन्म की घटना है कि बुद्ध पिछले जन्म में, जब वे अज्ञानी थे और बुद्ध नहीं हुए थे.। अज्ञान का एक ही मतलब है हमारे मुल्क में कि जब तक उनको पता नहीं चला था कि मैं भगवान हूं। जब तक वे जानते थे कि मैं आदमी हूं। तब जब वे अज्ञानी थे, उनके गांव में एक बुद्धपुरुष का आगमन हुआ। तो बुद्ध उनका दर्शन करने गए। उनके चरणों में गिरकर नमस्कार किया। और जब वे नमस्कार करके खड़े हुए, तो बहुत चकित हो गए। समझ में नहीं पड़ा कि क्या हो गया! वे जो बुद्धपुरुष थे, उन्होंने बुद्ध के चरणों में सिर रखकर नमस्कार किया।
तो बुद्ध बहुत घबड़ा गए और उन्होंने कहा, आप यह क्या करते हैं! इससे मुझे पाप लगेगा। मैं आपके पैर छुऊं, यह उचित है। क्योंकि आप पा चुके हैं, मैं अभी भटक रहा हूं। आप मंजिल हैं, मैं अभी रास्ता हूं। मैं आपके चरणों में झुकूं, यह ठीक है। अभी मेरी खोज बाकी है, आपकी खोज पूरी हो गई। आप क्यों मेरे चरणों में झपकते हो?
तो उन बुद्धपुरुष ने बुद्ध को कहा, तुझे वही दिखाई पड़ता है पर छोटा तूफान आता है। जमीन पर जो युद्ध होते हैं, उनका पीरियाडिकल जो वर्तुल है, वह ग्‍यारह साल है।

Tuesday, 19 May 2015

हां तक मांग है, वहां तक प्रभु से कोई संबंध स्थापित नहीं होता। प्रार्थना मांग नहीं है। ज्यादा उचित हो कि कहें, प्रार्थना धन्यवाद है, मांग नहीं। जो नहीं मिला है, उसकी मांग नहीं है प्रार्थना; जो मिला है, उसके अनुग्रह का धन्यवाद है, थैंक्स गिविंग है।
कुछ मांगें मत। आपकी मांग ही आपके और परमात्मा के बीच में बाधा बन जाएगी। क्योंकि जब भी हम कुछ मांगते हैं तो उसका अर्थ क्या होता है? उसका अर्थ होता है, जो हम मांग रहे हैं, वह परमात्मा से भी बड़ा है।
एक आदमी परमात्मा से धन मांग रहा है। उसका अर्थ हुआ कि लक्ष्य धन है; परमात्मा तो केवल साधन है। एक आदमी सुख मांग रहा है। उसका अर्थ हुआ कि सुख बड़ा है। परमात्मा से मिल सकता है, इसलिए परमात्मा से मांग रहे हैं। लेकिन परमात्मा केवल माध्यम हो गया; परमात्मा केवल साधन हो गया। हम परमात्मा से भी सेवा ले रहे हैं!
जब भी हम कुछ मांगते हैं, तो जो मांगते हैं, वह महत्वपूर्ण है। जिससे हम मांगते हैं, वह महत्वपूर्ण नहीं है। वह अगर महत्वपूर्ण मालूम होता है, तो सिर्फ इसीलिए कि जो हम चाहते हैं, वह उससे मिल सकता है। लेकिन उसका महत्व द्वितीय है, दोयम है, नंबर दो है।
तो परमात्मा से कुछ भी मांगा नहीं जा सकता। और जो मांगते हैं, उनका परमात्मा से कोई संबंध नहीं है। परमात्मा को तो, जो मिला है, उसके लिए धन्यवाद दिया जा सकता है। और जो मिला है, वह बहुत है, असीम है।
लेकिन जो मिला है, उसके लिए हम धन्यवाद नहीं देते। जो नहीं मिला है, उसके लिए हम मांग करते हैं, शिकायत करते हैं। अभाव ही हमारा मन देखता है। जो हमारे पास है, जो हमें मिला है, अकारण! जीवन, अस्तित्व, जो खिलावट हमें मिली है, उसके लिए कोई अनुग्रह नहीं है।
प्रार्थना अनुग्रह का भाव है।
ऐसा हुआ कि रामकृष्ण के पास जब विवेकानंद आए, तो उनके घर की हालत बड़ी बुरी थी। पिता मर गए थे। और पिता मौजी आदमी थे, तो कोई संपत्ति तो छोड़ नहीं गए थे, उलटा कर्ज छोड गए थे। और विवेकानंद को कुछ भी न सूझता था कि कर्ज कैसे चुके। घर में खाने को रोटी भी नहीं थी। और ऐसा अक्सर हो जाता था कि घर में इतना थोड़ा—बहुत अन्न जुट पाता, कि मां और बेटे दोनों थे, तो एक का ही भोजन हो सकता था।
तो विवेकानंद मां को कहकर कि मैं आज घर भोजन नहीं लूंगा, किसी मित्र के घर निमंत्रण है, मां भोजन कर ले, इसलिए घर से बाहर चले जाते। कहीं भी गली—कूचों में चक्कर लगाकर—कोई मित्र का निमंत्रण नहीं होता—वापस खुशी लौट आते कि बहुत अच्छा भोजन मिला, ताकि मां भोजन कर ले।
रामकृष्ण को पता लगा तो उन्होंने कहा, तू भी पागल है। तू जाकर मां से क्यों नहीं मांग लेता! तू रोज यहां आता है। जा मंदिर में और मां से मांग ले, क्या तुझे चाहिए। रामकृष्ण ने कहा तो विवेकानंद को जाना पड़ा। रामकृष्ण बाहर बैठे रहे। आधी घड़ी बीती। एक घड़ी बीती। घंटा बीतने लगा। तब उन्होंने भीतर झांककर देखा। विवेकानंद आंख बंद किए खड़े हैं। आंख से आनंद के आंसू बह रहे हैं। सारे शरीर में रोमांच है।
फिर जब विवेकानंद बाहर आए, तो रामकृष्ण ने कहा, मांग लिया मां से? विवेकानंद ने कहा, वह तो मैं भूल ही गया। जो मिला है, वह इतना ज्यादा है कि मैं तो सिर्फ अनुग्रह के आनंद में डूब गया। अब दोबारा जब जाऊंगा, तब मांग लूंगा।
दूसरे दिन भी यही हुआ। तीसरे दिन भी यही हुआ। रामकृष्ण ने कहा, पागल, तू मांगता क्यों नहीं है? तो विवेकानंद ने कहा कि आप नाहक ही मेरी परीक्षा ले रहे हैं। भीतर जाता हूं तो यह भूल ही जाता हुं कि वे क्षुद्र जरूरतें, जो मुझे घेरे हैं, वे भी हैं, उनका कोई अस्तित्व है। जब मां के सामने होता हूं तो विराट के सामने होता हूं तो क्षुद्र की सारी बात भूल जाती है। यह मुझसे नहीं हो सकेगा। रामकृष्ण ने अपने शिष्यों को कहा कि इसीलिए इसे भेजता था, कि अगर इसकी प्रार्थना अभी भी मांग बन सकती है, तो इसे प्रार्थना की कला नहीं आई। अगर यह अब भी मांग सकता है प्रार्थना के क्षण में, तो इसका मन संसार में ही उलझा है, परमात्मा की तरफ उठा नहीं है।
आप पूछते हैं कि क्या मांगें?
मांगें मत। मांग संसार है। और जो मांगना छोड़ देता है, वही केवल परमात्मा में प्रवेश करता है। तो कुछ भी न मांगें। सुख नहीं, कुछ भी मत मांगें। मोक्ष भी मत मांगें, मुक्ति भी मत मांगें। क्योंकि मांग ही उपद्रव है। मांग ही बाधा है। वह जो मांगने वाला मन है, वह प्रार्थना में हो ही नहीं पाता।
साधारणत: हमने सारी प्रार्थना को मांग बना लिया है। मांगना चाहते हैं, तभी हम प्रार्थना करते हैं। प्रार्थी का मतलब ही हो गया मांगने वाला। अन्यथा हम प्रार्थना ही नहीं करते। जब मांगना होता है, तभी प्रार्थना करते हैं। जब नहीं मांगना होता, तो प्रार्थना भी खो जाती है। हमारी सारी प्रार्थना भिक्षु की, मांगने वाले की प्रार्थना है। हम भिक्षा—पात्र लेकर ही परमात्मा के सामने खड़े होते हैं। यह ढंग उचित नहीं है। यह प्रार्थना का ढंग ही नहीं है। फिर प्रार्थना क्या है? साधारणत: लोग समझते हैं कि प्रार्थना कुछ करने की चीज है—कि आपने जाकर स्तुति की, कि गुणगान किया, कि भगवान की बड़ी प्रशंसा की—कुछ करने की चीज है। प्रार्थना न तो मांग है और न कुछ करने की चीज है। प्रार्थना एक मनोदशा है।
उचित होगा कहना कि प्रार्थना की नहीं जाती, आप प्रार्थना में हो सकते हैं। यू कैन नाट डू प्रेयर, यू कैन बी इन इट। प्रार्थना में हो सकते हैं, प्रार्थना की नहीं जा सकती। वह कोई कृत्य नहीं है कि आपने कुछ किया—घंटा बजाया, नाम लिया। वे सब बाह्य उपकरण हैं। प्रार्थना भीतर की एक मनोदशा है; ए स्टेट ऑफ माइंड।
दो तरह की मनोदशाएं हैं। मांग, डिजायर, वासना। वासना कहती है, यह चाहिए। मन की एक दशा है कि यह चाहिए, यह चाहिए, यह चाहिए। चौबीस घंटे हम वासना में हैं, यह चाहिए, यह चाहिए, यह चाहिए। एक क्षण ऐसा नहीं है, जब वासना न हो। कुछ न कुछ चाहिए। चाह धुएं की तरह चारों तरफ घेरे रहती है।

Monday, 18 May 2015

निश्चित ही असंगत है। इससे ज्यादा बड़ी भूल की कोई और बात नहीं कि कोई भगवान को खोजे। क्योंकि खोजा केवल उसी को जा सकता है, जिसे हमने खो दिया हो। जिसे हमने खोया ही नहीं है, उसे खोजने का कोई उपाय नहीं है। लेकिन जब यह पता चल जाए कि मैं भगवान हूं तभी खोज असंगत है, उसके पहले असंगत नहीं है। उसके पहले तो खोज करनी ही पड़ेगी।
खोज से भगवान न मिलेगा, खोज से सिर्फ यही पता चल जाएगा कि जिसे मैं खोज रहा हूं वह कहीं भी नहीं है, बल्कि जो खोज रहा है वहीं है। खोज की व्यर्थता भगवान पर ले आती है, खोज की सार्थकता नहीं।
इसे थोड़ा समझना कठिन होगा, लेकिन समझने की कोशिश करें। यहां खोजने वाला ही वह है जिसकी खोज चल रही है। जिसे आप खोज रहे हैं वह भीतर छिपा है। इसलिए जब तक आप खोज करते रहेंगे, तब तक उसे न पा सकेने। लेकिन कोई सोचे कि बिना खोज किए, ऐसे जैसे हैं ऐसे ही रह जाएं, तो उसे पा लेंगे, वह भी न पा सकेगा। क्योंकि अगर बिना खोज किए आप पा सकते होते तो आपने पा ही लिया होता। बिना खोज किए मिलता नहीं, खोजने से भी नहीं मिलता। जब सारी खोज समाप्त हो जाती है और खोजने वाला चुक जाता है, कुछ खोजने को नहीं बचता, उस क्षण यह घटना घटती है।
कबीर ने कहा है, खोजत—खोजत हे सखी रह्या कबीर हिराइ। खोजते—खोजते वह तो नहीं मिला, लेकिन खोजने वाला धीरे— धीरे खो गया। और जब खोजने वाला खो गया, तो पता चला कि जिसे हम खोजते थे वही भीतर मौजूद है।
हम जब परमात्मा को भी खोजते हैं, तो ऐसे ही जैसे हम दूसरी चीजों को खोजते हैं। कोई धन को खोजता है, कोई यश को खोजता है, कोई पद को खोजता है। आंखें बाहर खोजती हैं— धन को, पद को, यश को, ठीक। हम भगवान को भी बाहर खोजना शुरू कर देते हैं। हमारी खोज की आदत बाहर खोजने की है। उसे भी हम बाहर खोजते हैं। बस वहीं भूल हो जाती है। वह भीतर है। वह खोजने वाले की अंतरात्मा है।
लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि मैं आपसे कह रहा हूं कि खोजें मत। आप खोज ही कहां रहे हैं जो आपसे कहूं कि खोजें मत। जो खोज रहा हो, खोजकर थक गया हो, उससे कहा जा सकता है रुक जाओ। जो खोजने ही न निकला हो, जो थका ही न हो, जिसने खोज की कोई चेष्टा ही न की हो, उससे यह कहना कि चेष्टा छोड़ दो, नासमझी है। चेष्टा छोड़ने के लिए भी चेष्टा तो होनी ही चाहिए।
एक मजे की बात इससे मुझे स्मरण आती है। एक मित्र ने पूछी भी है, उपयोगी होगी। कृष्‍ण भी कहते हैं कि वेद में मैं नहीं मिलूंगा, शास्त्र में नहीं मिलूंगा, यश में नहीं मिलूंगा, योग में, तप में नहीं मिलूंगा। लेकिन आपको पता है यह किन लोगों से कहा है उन्होंने? जो वेद में खोज रहे थे, यश में खोज रहे थे, तप में खोज रहे थे, योग में खोज रहे थे, उनसे कहा है। आपसे नहीं कहा है। आप तो खोज ही नहीं रहे हैं।
बुद्ध ने कहा है, शास्त्रों को छोड़ दो, तो ही सत्य मिलेगा। लेकिन यह उनसे कहा है जिनके पास शास्त्र थे। कृष्णमूर्ति भी लोगों से कह रहे हैं, शास्त्रों को छोड़ दो, सत्य मिलेगा। लेकिन वे उनसे कह रहे हैं जो शास्त्र को पकड़े ही नहीं हैं। आप छोडिएगा खाक? जिसको पकड़ा ही नहीं उसको छोडिएगा कैसे?
कृष्णमूर्ति को सुनने वाले लोग सोचते हैं कि तब तो ठीक। सत्य ‘ तो हमें मिला ही हुआ है, क्योंकि हमने शास्त्र को कभी पकड़ा ही नहीं। जिसने पकड़ा नहीं है वह छोड़ेगा कैसे? और सत्य मिलेगा छोड़ने से। पकड़ना उसका अनिवार्य हिस्सा है।
आपके पास जो है वही आप छोड़ सकते हैं। जो आपके पास नहीं है उसे कैसे छोडिएगा? आपकी खोज होनी चाहिए। और जब आप खोज से थक जाएंगे; ऊब जाएंगे; परेशान हो जाएंगे; जब न खोजने को कोई रास्ता बचेगा, न खोजने की हिम्मत बचेगी; जब सब तरफ फ्रस्ट्रेटेड, सब तरफ उदास टूटे हुए आप गिर पड़ेंगे, उस गिर पड़ने में उसका मिलना होगा। क्योंकि जब बाहर खोजने को कुछ भी नहीं बचता, तभी आंखें भीतर की तरफ मुड़ती हैं। और जब बाहर चेतना को जाने के लिए कोई मार्ग नहीं रह जाता, तभी चेतना अंतर्गामी होती है।

Sunday, 17 May 2015

एक मित्र ने पूछा है कि यदि मां के पेट में पुरुष और स्त्री आत्मा के जन्मने के लिए अवसर पैदा करते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि आत्माएं अलग— अलग हैं और सर्वव्यापी आत्मा नहीं है। उन्होने यह भी पूछा है कि मैने तो बहुत बार कहा है कि एक ही सत्य है एक ही परमात्मा है एक ही आत्मा है फिर ये दोनों बातें तो कंट्राडिक्टरी विरोधी मालूम होती हैं।
ये दोनों बातें विरोधी नहीं हैं। परमात्मा तो एक ही है, आत्मा तो वस्तुत: एक ही है, लेकिन शरीर दो प्रकार के हैं। एक शरीर जिसे हम स्थूल शरीर कहते हैं, जो हमें दिखाई पड़ता है, एक शरीर जो सूक्ष्म शरीर है, जो हमें दिखाई नहीं पड़ता है। एक शरीर की जब मृत्यु होती है, तब स्थूल शरीर तो गिर जाता है, लेकिन जो सूक्ष्म शरीर है, वह जो सटल बाडी है, वह नहीं मरती है। आत्मा दो शरीरों के भीतर वास कर रही है, एक सूक्ष्म शरीर और एक स्थूल शरीर। मृत्यु के समय स्थूल शरीर गिर जाता है। यह जो मिट्टी —पानी से बना हुआ शरीर है, यह जो हड्डी—मांस —मज्जा की देह है, यह गिर जाती है। फिर अत्यंत सूक्ष्म विचारों का, सूक्ष्म संवेदनाओं का, सूक्ष्म वायब्रेशंस का, सूक्ष्म तंतुओं का शरीर शेष रह जाता है।
वह तंतुओं से घिरा हुआ शरीर आत्मा के साथ फिर यात्रा शुरू करता है और फिर नए जन्म के लिए स्थूल शरीर में प्रवेश करता है। जब एक मां के पेट में नई आत्मा का प्रवेश होता है, तो उसका अर्थ है सूक्ष्म शरीर का प्रवेश। मृत्यु के समय सिर्फ स्थूल शरीर गिरता है, सूक्ष्म शरीर नहीं। लेकिन परम मृत्यु के समय—जिसे हम मोक्ष कहते हैं —उस परम मृत्यु के समय स्थूल शरीर के साथ ही सूक्ष्म शरीर भी गिर जाता है। फिर आत्मा का कोई जन्म नहीं होता, फिर वह आत्मा विराट में लीन हो जाती है। वह जो विराट में लीनता है, वह एक ही है। जैसे एक बूंद सागर में गिर जाती है।
तीन बातें समझ लेनी जरूरी हैं। आत्मा का तत्व एक है। उस आत्मा के तत्व के संबंध में आकर दो तरह के शरीर सक्रिय होते हैं—एक स्थूल शरीर और एक सूक्ष्म शरीर। स्थूल शरीर से हम परिचित हैं, सूक्ष्म शरीर से योगी परिचित होता है। और योग के भी जो ऊपर उठ जाते हैं, वे उससे परिचित होते हैं जो आत्मा है।
सामान्य आंखें देख पाती हैं स्थूल शरीर को। योग —दृष्टि, ध्यान देख पाता है सूक्ष्म शरीर को। लेकिन ध्यानातीत, बियांड योग, सूक्ष्म के भी पार, उसके भी आगे जो शेष रह जाता है, उसका तो समाधि में अनुभव होता है। ध्यान से भी जब व्यक्ति ऊपर उठ जाता है, तो समाधि फलित होती है। और उस समाधि में जो अनुभव होता है, वह परमात्मा का अनुभव है।
साधारण मनुष्य का अनुभव शरीर का अनुभव है, साधारण योगी का अनुभव सूक्ष्म शरीर का अनुभव है, परम योगी का अनुभव परमात्मा का अनुभव है। परमात्मा एक है, सूक्ष्म शरीर अनंत हैं, स्थूल शरीर अनंत हैं। वह जो सूक्ष्म शरीर है, वह है कॉजल बाडी। वह जो सूक्ष्म शरीर है, वही नए स्थूल शरीर ग्रहण करता है। हम यहां देख रहे हैं कि बहुत से बल्‍ब जले हुए हैं। विद्युत तो एक है, विद्युत बहुत नहीं है। वह ऊर्जा, वह शक्ति, वह इनर्जी एक है, लेकिन दो अलग बल्बों से वह प्रकट हो रही है। बल्‍ब का शरीर अलग — अलग है, उसकी आत्मा एक है। हमारे भीतर से जो चेतना झांक रही है, वह चेतना एक है। लेकिन उस चेतना के झांकने में दो उपकरणों का, दो वेहिकल्स का प्रयोग किया गया है। एक सूक्ष्म उपकरण है, सूक्ष्म देह; और दूसरा उपकरण है, स्थूल देह।
हमारा अनुभव स्थूल देह तक ही रुक जाता है। यह जो स्थूल देह तक रुक गया अनुभव है, यही मनुष्य के जीवन का सारा अंधकार और दुख है। लेकिन कुछ लोग सूक्ष्म शरीर पर भी रुक सकते हैं। जो लोग सूक्ष्म शरीरों पर रुक जाते हैं, वे ऐसा कहेंगे कि आत्माएं अनंत हैं। लेकिन जो सूक्ष्म शरीर के भी आगे चले जाते हैं, वे कहेंगे, परमात्मा एक है, आत्मा एक है, ब्रह्म एक है।
मेरी इन दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है। मैंने जो आत्मा के प्रवेश के लिए कहा, उसका अर्थ है वह आत्मा जिसका अभी सूक्ष्म शरीर गिर नहीं गया है। इसलिए हम कहते हैं कि जो आत्मा परम मुक्ति को उपलब्ध हो जाती है, उसका जन्म —मरण बंद हो जाता है। आत्मा का तो कोई जन्म —मरण है ही नहीं, वह तो न कभी जन्मी है और न कभी मरेगी। वह जो सूक्ष्म शरीर है, वह भी समाप्त हो जाने पर कोई जन्म —मरण नहीं रह जाता है। क्योंकि सूक्ष्म शरीर ही कारण बनता है नए जन्मों का।
सूक्ष्म शरीर का अर्थ है, हमारे विचार, हमारी कामनाएं, हमारी वासनाएं, हमारी इच्छाएं, हमारे अनुभव, हमारा शान, इन सबका जो संग्रहीभूत, जो इंटिग्रेटेड सीड है, इन सबका जो बीज है, वह हमारा सूक्ष्म शरीर है। वही हमें आगे की यात्राओं पर ले जाता है। लेकिन जिस मनुष्य के सारे विचार नष्ट हो गए, जिस मनुष्य की सारी वासनाएं क्षीण हो गईं, जिस मनुष्य की सारी इच्छाएं विलीन हो गईं, जिसके भीतर अब कोई भी इच्छा शेष न रही, उस मनुष्य को जाने के लिए कोई जगह नहीं बचती, जाने का कोई कारण नहीं रह जाता। जन्म की कोई वजह नहीं रह जाती।

Saturday, 16 May 2015

हली बात तो यह समझ लेनी जरूरी है कि मृत्यु पर विजय मिल सकती है, इसका यह अर्थ नहीं है कि मृत्यु है और हम उसे जीत लेंगे। मृत्यु पर विजय मिल सकती है, इसका इतना ही अर्थ है कि मृत्यु नहीं है, ऐसा हम जान लेंगे। मृत्यु का न होना जान लेना ही मृत्यु पर विजय है। मृत्यु कोई है नहीं जिसे जीत लेना है। मृत्यु नहीं है, ऐसा जानते ही वह जो मृत्यु से हमारी हार चल रही है, बंद हो जाती है। कुछ तो ऐसे शत्रु हैं, जो हैं। और कुछ ऐसे शत्रु हैं, जो नहीं हैं, सिर्फ प्रतीत होते हैं। मृत्यु उन शत्रुओं में से है, जो नहीं है और प्रतीत होता है।
इसलिए विजय का अर्थ ऐसा नहीं ले लेना कि कोई मृत्यु कहीं है और उसे हम जीत लेंगे। जैसे कोई आदमी अपनी छाया से लड़ने लगे और पागल हो जाए। और फिर हम उसे कहें कि गौर से देखो, छाया है ही नहीं! और वह छाया को देखे और हंसने लगे और जाने कि मैंने छाया को अब जीत लिया। छाया को जीतने का केवल इतना ही अर्थ है कि छाया इतनी भी न थी कि उससे लड़ा जाए। जो लड़ेगा, वह पागल हो जाएगा। जो मृत्यु से लड़ेगा, वह हार जाएगा। और जो मृत्यु को जान लेगा, वह जीत जाएगा।
इसका दूसरा मतलब यह भी हुआ कि अगर मृत्यु नहीं है, तो वस्तुत: हम कभी मरते ही नहीं हैं। चाहे हम जानते हों और चाहे न जानते हों। ऐसा नहीं है कि दुनिया में दो तरह के लोग हैं, एक वे जो मरते हैं और एक वे जो नहीं मरते हैं, ऐसा नहीं है। दुनिया में कोई भी कभी नहीं मरता है। लेकिन दुनिया में दो तरह के लोग हैं, एक वे जो जानते हैं कि नहीं मरते हैं, और एक वे जो नहीं जानते हैं। इतना ही फर्क है।
निद्रा में भी हम वहीं पहुंचते हैं, जहां ध्यान में पहुंचते हैं। लेकिन फर्क इतना ही है कि निद्रा में हम बेहोश होते हैं और ध्यान में हम जाग्रत होते हैं। अगर कोई निद्रा में भी जाग्रत होकर पहुंच जाए, तो वही हो जाएगा जो ध्यान में होता है। जैसे किसी बगीचे में किसी आदमी को हम क्लोरोफार्म देकर ले जाएं, स्ट्रेचर पर रखकर—बेहोश। स्ट्रेचर पर बेहोश पडा आदमी है, उसको हम बगीचे में ले जाएं। बगीचे में फूल होंगे, कोई बेहोश आदमी की वजह से फूल मिट नहीं जाएंगे, हवाएं होंगी, सुगंध होगी, सूरज निकला होगा, पक्षी गीत गाते होंगे, लेकिन उस आदमी को कुछ भी पता नहीं चलेगा। फिर हम उस बेहोश आदमी को बगीचे में घुमाकर वापस लौट आएं। वह आदमी जब होश में आए और हम उससे कहें कि देखा बगीचा? जाना बगीचा? वह कहेगा, कैसा बगीचा? फिर उस आदमी को हम कहें कि तब तुम होश में चलो। तो वह आदमी कहे कि होश में बगीचे में ही पहुंचूंगा न! तो फिर बेहोशी में पहुंचने में और होश में पहुंचने में फर्क क्या है? तब हम उससे कहेंगे कि फर्क इतना है कि होश में तुम जान सकोगे कि कहां पहुंचे, क्या देखा—फूल, सुगंध, पक्षियों के गीत, सुबह का सूरज। बेहोशी में तुम नहीं देख सकोगे। पहुंचोगे तो बेहोशी में भी उतना ही, जितना कि होश में पहुंचे थे। लेकिन बेहोशी में पहुंचा हुआ आदमी ऐसे ही रहता है, जैसे न पहुंचा हो। बेहोशी में पहुंचने का मतलब न पहुंचना ही है।
हम नींद में भी वहीं पहुंचते हैं जहां ध्यान में कोई पहुंचता है। नींद में भी उसी बगीचे: में प्रवेश कर जाते हैं, उसी जीवन के बगीचे में, जहां ध्यान में कोई प्रवेश करता है। लेकिन नींद में हम होते हैं बेहोश। रोज पहुंचते हैं और वापस लौट आते हैं।
हां, इतनी बात पक्की है कि चाहे कोई आदमी बेहोश बगीचे में गया हो, सुबह की ताजी हवाओं ने उसके शरीर को तो छुआ ही होगा, सुगंध उसके नासापुटों तक तो गई ही होगी, पक्षियों के गीत उसके कान तक तो गंजे ही होंगे। वह नहीं जान सका, लेकिन बगीचे से बेहोश लौट आने पर भी शायद जगने पर वह कहे कि आज बड़ा अच्छा लग रहा है, बड़ी शाति मालूम हो रही है। नींद के बाद सुबह आप रोज कहते हैं कि नींद आ गई तो बड़ा अच्छा लग रहा है। क्या लग रहा है अच्छा? नींद आने से क्या अच्छा हो गया? जरूर नींद में आप कहीं गए हैं, जहां कुछ हुआ है, लेकिन उसका कोई पता नहीं। सिर्फ छोटी—सी खबर रह गई है पीछे कि अच्छा लग रहा है, सुबह जागकर अच्छा लग रहा है। तो जो आदमी रात गहरी नींद में पहुंच जाता है, वह सुबह ताजा होकर लौट आता है। वह किसी ताजगी के स्रोत तक गया है, लेकिन बेहोश। और जो आदमी रात नहीं सो पाता, वह सुबह और भी थका—मादा होता है, जितना सांझ को थका—मादा नहीं था। और अगर एक आदमी कुछ दिन तक न सो पाए, तो जीवन दूभर हो जाता है, क्योंकि जीवन के स्रोत से उसके संबंध विच्छिन्न हो जाते हैं। वह वहां तक नहीं पहुंच पाता है, जहां तक पहुंचना अत्यंत जरूरी है।
दुनिया में कठिन से कठिन अगर कोई सजा हो सकती है, तो वह मौत की नहीं है। मौत की सजा तो सरल है, क्षण भर में हो जाती है। सबसे बड़ी सजाएं जिन लोगों ने ईजाद की थीं, वह सजाएं थीं नींद न आने देने की। किसी व्यक्ति को नींद न आने देना सबसे बड़ी सजा है। तो आज भी चीन में या रूस में या हिटलर के जर्मनी में निरंतर कैदियों को जगाए रखने का उपाय किया जाता है। पंद्रह दिन किसी कैदी को न सोने दिया जाए, तो उसकी जो पीड़ादायक स्थिति हो जाती है, उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। वह करीब—करीब विक्षिप्त हो जाता है और वह वे सब बातें बोलने लगता है जिन्हें उसने रोकने की कोशिश की थी, जिन्हें कि उसके दुश्मन जानना चाहते हैं। वह अपने — आप बोलने लगता है, अनर्गल उसके मुंह से सब निकलने लगता है। उसे होश ही नहीं रह जाता है कि अब क्या हो रहा है।