Sunday, 15 March 2015

एक दौड़ है आदमी की कि सब पर कब्जा कर ले। और खुद न कर पाये तो दूसरा तो कर ही लेगा।
इसलिए देर करनी नहीं। इसलिए तो इतनी आपाधापी है, इतनी जल्दी है। चैन कहां, शांति कहां! बैठ कैसे सकते हो! एक क्षण विश्राम किया तो चूके। सब तो विश्राम नहीं करेंगे। दूसरे तो दौड़े चले जा रहे हैं। तो दौड़े चलो, दौड़े चलो! मरघट में पहुंच कर ही रुकना। कब में गिरो, तभी रुकना। लेकिन सत्य की संपदा तो असीम है। बुद्ध की महावीर से कोई प्रतिस्पर्धा थोड़े ही है, कि बुद्ध को मिल गया तो महावीर को न मिलेगा, कि महावीर को मिल गया तो कृष्ण को न मिलेगा, कि अब कृष्ण को मिल गया तो अब मुहम्मद को कैसे मिले! सत्य विराट है, खुले आकाश जैसा है; तुम्हें जितना पीना हो पीओ; तुम्हें जितना डूबना हो डूबो—तुम चुका न पाओगे।
इसलिए सत्य के जगत में क्या प्रथम क्या अंतिम! प्रथम और अंतिम तो वहां उपयोगी हैं जहां संघर्ष हो।
और शिष्य तो अंतिम ही होना चाहिए। शिष्यत्व का अर्थ ही यही है : अंतिम खड़े हो जाने की तैयारी; पंक्ति में पीछे खड़े हो जाने की तैयारी। गुरु के लिए सर्वाधिक प्रिय वही हो जाता है जो सबसे ज्यादा अंतिम में खड़ा है। और अगर गुरु को वे प्रिय हों केवल जो प्रथम खड़े हैं तो गुरु गुरु भी नहीं। शिष्य तो शिष्य हैं ही नहीं, गुरु भी गुरु नहीं है। जो चुप खड़ा है, मौन प्रतीक्षा करता है, जिसने कभी माया भी नहीं, जिसने कभी शोरगुल भी नहीं मचाया, जिसने कभी यह भी नहीं कहा कि बहुत देर हो गई है, कब तक मुझे खड़ा रखेंगे; दूसरों को मिला जा रहा है और मैं वंचित रहा जा रहा हूं—जिसने यह कोई बात ही न कही; जिसकी प्रतीक्षा अनंत है; और जिसका धैर्य अपूर्व है—ऐसी अंतिम स्थिति हो तो निश्चित ही मैं तुमसे कहता हूं. जो अंतिम हैं वही प्रथम हैं।
लेकिन अंतिम खड़े हो कर भी अगर प्रथम होने का राग मन में हो और प्रथम होने की आकांक्षा जलती हो तो तुम खड़े ही हो अंतिम, अंतिम हो नहीं। ध्यान रखना, अंतिम खड़े होने से अंतिम का कोई संबंध नहीं।
बहुत संन्यासी इसी तरह से संन्यास लेते हैं। जिंदगी में तो दिखाई पड़ता है यहां जीत होगी नहीं; यहां तो हम से बड़े पागल जूझे हुए हैं। यहां तो बड़ा मुश्किल है। बड़ी छीन—झपट है। गला—घोंट प्रतियोगिता है। यहां तो प्राण निकल जाएंगे। यहां जीतने की तो बात दूर, धूल में मिल जाएंगे। लाश पर लोग चलेंगे। यहां से हट ही जाओ। ऐसी पराजय और विषाद की दशा में जो हटता है वह अंतिम नहीं है। उसके भीतर तो प्रथम होने की आकांक्षा है ही। अब वह संन्यासियों के बीच प्रथम होने की कोशिश करेगा; त्यागियों के बीच प्रथम होने की कोशिश करेगा। अगर इस संसार में नहीं सधेगा तो कम से कम परमात्मा के लोक में.।
जीसस की मृत्यु के दिन उनके शिष्य रात जब विदा करने लगे तो पूछा कि एक बात तो बता दें जाते—जाते : जब प्रभु के राज्य में हम पहुंचेंगे तो आप तो निश्चित ही प्रभु के बिलकुल बगल में खड़े होंगे, आपकी बगल में कौन खड़ा होगा? हम बारह शिष्यों में से वह सौभाग्य किसका होगा? उगपका तो पक्का है कि आप परमात्मा के ठीक बगल में खड़े होंगे, वह तो बात ठीक। आपके पास कौन खड़ा होगा? हम बारह हैं। इतना तो साफ कर दें, हमारा क्रम क्या रहेगा?
सोचते हैं? इनको संन्यासी कहिएगा? यही जीसस के पैगंबर बने, यही उनका पैगाम ले जाने वाले बने! इन्होंने जीसस की खबर दुनिया में पहुंचाई। ये जीसस को समझे होंगे, जो आखिरी वक्त ऐसी बेहूदी बात पूछने लगे? जुदास तो धोखा दे ही गया है, इन्होंने भी धोखा दे दिया है। जुदास ने तो तीस रुपये में बेच दिया, पर ये भी बेचने को तैयार हैं; इनकी भी बुद्धि वही की वही है। इस संसार में इनमें से कोई मछुआ था, कोई बढ़ई था, कोई लकड़हारा था, इस दुनिया में ये हारे हुए लोग थे, इस दुनिया को छोड्कर अब ये सपना देख रहे हैं कि वहां दूसरी दुनिया में चखा देंगे मजा—धनपतियों को, सम्राटों को, राजनीतिज्ञों को, कि खड़े रहो पीछे! हम प्रभु के पास खड़े हैं! हमने वहां दुख भोगा!
ऐसी आकांक्षा हो तो तुम अंतिम नहीं। तो अंतिम का अर्थ समझ लेना। अंतिम जो खड़ा है, ऐसा अतिमू का अर्थ नहीं है। जो अंतिम होने को राजी है; जिसकी प्रथम होने की दौड़ शांत हो गई है, शून्य हो गयी है; जिसने कहा, मैं जहां खड़ा हूं यही परमात्मा का प्रसाद है; मैं जहां खड़ा हूं बस इससे अन्यथा की मेरी कोई चाह नहीं, मांग नहीं, तृप्त हूं यहां—ऐसा जो अंतिम हो तो प्रथम हो जाना निश्चित है!

Saturday, 14 March 2015

ध्यान के लिए संकल्प चाहिए। संकल्प का अर्थ होता है सारी ऊर्जा को एक बिंदु पर संलग्न कर देना। संकल्प का अर्थ होता है अपनी ऊर्जा को विभाजित न करना। क्योंकि अविभाज्य ऊर्जा हो, तो ही कहीं पहुंचना हो सकता है।
जैसे सूरज की किरणें हैं। अगर इनको तुम इकट्ठा कर लो, एक जगह कर लो, तो आग पैदा हो जाए। बिखरी रहें, तो आग पैदा नहीं होती। ऐसी ही मनुष्य की जीवन ऊर्जा है। एक जगह पड़े, एक बिंदु पर गिरने लगे, तो महाशक्ति प्रज्वलित होती है। पच्चीस धाराओं में बहती रहे, तो धीरे—धीरे खो जाती है। जैसे नदी रेगिस्तान में खो जाए। कहीं पहुंचती नहीं।
तुम दो तरह से जी सकते हो संकल्पहीन या संकल्पवान। संकल्पहीन का अर्थ होता है : तुम्हारे जीवन में पच्चीस धाराएं हैं। धन भी कमा लूं पद भी कमा लूं प्रतिष्ठा भी बना लूं। साधु भी कहलाऊं; ध्यान भी कर लूं; मंदिर भी हो आऊं, दुकान भी चलती रहे। तुम्हारा जीवन पच्चीस धाराओं में विभाजित है। इसलिए कुछ भी पूरा नहीं हो पाता। न दुकान पूरी होती, न मंदिर पूरा होता। न धन मिलता, न ध्यान मिलता। ऊर्जा संगृहीत होनी चाहिए, तो संकल्प का जन्म होता है। एक धारा में गिरे, अखंडित गिरे, तो कुछ भी असंभव नहीं है। जीवन में चीजें असंभव इसलिए मालूम हो रही हैं, क्योंकि तुम टूटे हो खंड—खंड, टुकड़े—टुकड़े में। तुम एक नहीं हो, इसलिए जीवन में बहुत सी चीजें असंभव हैं। तुम एक हो जाओ, तो कुछ भी असंभव नहीं है। संकल्प का यही अर्थ होता है।
यात्रा तो व्यक्ति को स्वयं ही करनी है। भरोसे की कमी है। गुरु की जरूरत है भरोसे के कारण। जिस दिन तुम्हारी यात्रा पूरी हो जाएगी, उस दिन तुम पाओगे : गुरु मे कुछ भी नहीं किया और बहुत कुछ भी किया।
कुछ भी नहीं किया इस अर्थों में कि जिस दिन तुम यात्रा पूरी कर लोगे, तुम पाओगे कि गुरु पास—पास तैरता रहा; तुम्हें भरोसा बना रहा कि अगर डूबूंगा, तो कोई बचा लेगा। लेकिन तैरते तुम रहे। तुम तैरकर पहुंचे अपने आप। शायद गुरु ने हाथ भी न लगाया हो; लेकिन पास—पास तैरता रहा।
तो एक अर्थ में तो कुछ भी नहीं किया म हाथ भी नहीं लगाया। हाथ लगाने की जरूरत ही नहीं है। तुम पहुंच सकते हो, इतनी शक्ति परमात्मा ने प्रत्येक को दी है कि वापस मूलस्रोत तक पहुंच जाए। इतना पाथेय सभी के भीतर रखा है। इतना कलेवा तुम लेकर ही पैदा हुए हो कि यात्रा पूरी हो जाए, और भोजन चुके नहीं।
लेकिन तुममें भरोसे की कमी है और वह भी स्वाभाविक है। कभी जिस मार्ग पर चले नहीं, उस मार्ग पर चलने में भरोसा हो कैसे! श्रद्धा का अभाव है। आत्मश्रद्धा नहीं है। तुम्हें डर है कि मुझसे न हो सकेगा। और तुम्हारे डर के कारण हैं, सुनिश्चित कारण हैं। छोटी—छोटी चीजें की हैं और नहीं हो सकीं। कभी सिगरेट पीते थे और छोड़ना चाही—नहीं छूटी। वर्षों मेहनत की और नहीं छूटी। कितनी ही बार तय किया और नहीं छूटी। और हर बार तय करके गिरे; और हर बार तय करके पछताए; और फिर पीया, और फिर भूल की; फिर अपराध हुआ। धीरे— धीरे ग्लानि बढ़ती गयी; आत्म—विश्वास खोता गया। एक बात साफ हो गयी कि तुम्हारे किए कुछ होने वाला नहीं है। क्षुद्र सी बात नहीं छूटती!

Friday, 13 March 2015

आज से दो हजार साल पहले कोई ब्राह्मण मरता तो शूद्र के घर में पैदा होता, सौ मैं निन्यानबे मौके पर सम्भव नहीं था। शूद्र के घर में पैदा नहीं हो सकता था। आत्मा का आवागमन इतना ही कठिन था। क्योंकि आवागमन ही नहीं था। चित्त तो सारे संस्कार लेता है। जिस शूद्र को कभी छुआ नहीं, जिसकी छाया से बचे, जिसकी छाया पड़ गयी तो सान किया, अलंध्य खाई रही जिसके और हमारे बीच।
मरने के बाद आत्मा यात्रा नहीं कर सकती। क्योंकि यात्रा जो चित्त कराएगा वह चित्त बिलकुल ही खिलाफ है। कोई यात्रा नहीं हो सकती। इसलिए महावीर के समय तक बहुत कभी ऐसा मौका होता था कि कोई आदमी कोई धर्म परिवर्तन में पैदा हो जाए। यह सम्भव नहीं था। धाराएं इतनी बंधी थीं, लीकें इतनी साफ थीं कि आप इस जन्म में ही अपने धर्म के भीतर घुमते थे। ऐसा नहीं है, आप अगले जन्म में भी उसी धर्मों के भीतर घूमते थे। अब यह सम्भव नहीं रहा। अब चीजें जैसे बाहर उदार हो गयी हैं वैसे भीतर भी उदार हो गयी हैं। वह चित्त की बात है।
आज मुसलमान के साथ बैठकर खाना खाने में किसी ब्राह्मण को कोई तकलीफ कम हुई है और भी कम होती चली जाएगी। और जिसको कम नहीं हुई है वह आज का आदमी नहीं है। उसके पास चित्त पांच सौ साल पुराना है। आज के आदमी को तो बिलकुल कम हो गयी है। आज तो सोचना भी उसे बेहूदा मालूम पड़ता है कि इस तरह की बात सोचे। इससे भीतरी आवागमन का भी द्वार खुल गया है, यह खयाल में ले लेना जरूरी है।
इधर पांच सौ वर्ष में रोज द्वार खुलता चला गया है। वह जो भीतर का द्वार खुल गया है उसके कारण, आज कुछ बातें कही जा सकती हैं। अगर मैंने अपने पिछले जन्मों में अनेक मार्गों पर घूमकर देखा हो तो मेरे लिए बहुत आसान हो जाता है कि मैं कुछ कह सकूं। अगर आज एक तिब्बती साधक मुझसे पूछता हो तो उससे मैं कह सकता हूं। लेकिन तभी कह सकता हूं जब कि किसी न किसी यात्रा में तिब्बतन जो मिल्‍यू है, तिब्बती जो वातावरण है, उसमें मैं जिया हूं अन्यथा मैं नहीं कह सकता हूं। और अगर मैं कहूंगा तो ऊपरी होगा, बहुत गहरा नहीं हो सकता। जब तक कि मैं किसी जगह से नहीं गुजरा होऊं तब तक मैं बहुत कुछ नहीं कह सकता।

Thursday, 12 March 2015

यहां मैं शराब निश्चित बांटता हूं। मगर वह शराब ऐसी नहीं कि तुम भूल जाओ। वह शराब ऐसी है, जो होश लाए। वह होश लाने वाली शराब है। बेहोशी लाने वाली शराबें तो सब तरफ मिल रही हैं। बेहोशी लाने वाली शराब में कितना मूल्य है? थोड़ी देर को भूल जाओगे, फिर याद आएगी। और घनी होकर आएगी। थोडी देर को भूल जाओगे, तब भी भीतर तो सरकती ही रहेगी।
चिंता से भरा आदमी शराब पी लेता है। चलो, रात गुजर गयी। सुबह फिर चिंताएं वहीं की वहीं खड़ी हैं। और बड़ी होकर खड़ी हैं। क्योंकि रात हल कर ली होतीं, तो उनकी उम्र कम थी। अब रातभर और गुजर गयी। उनकी उम्र ज्यादा हो गयी। वे और मजबूत हो गयीं। उनकी जड़ें और फैल गयीं। फिर शराब पी ली। ऐसे दो—चार—दस दिन गुजार दिए, तो चिंताएं तुम्हारे भीतर गहरी, मजबूती से जड़ जमा लेंगी। उनको हल करना रोज—रोज कठिन हो जाएगा।
बेहोशी से कुछ लाभ नहीं है। और तुम संगीत में भी बेहोशी खोजते हो। और तुम सुंदरी में भी बेहोशी खोजते हो। और तुम संपत्ति में भी बेहोशी खोजते हो। और तुम सम्मान में भी बेहोशी खोजते हो। तुम बेहोशी ही खोजते हो।
यहां तो कम से कम बेहोशी खोजने न आओ। यहां होश खोजो। यहां जागो। निश्चित ही यह जागना भी एक ऐसी अदभुत कीमिया है कि इससे तुम जागोगे भी और मस्त भी हो जाओगे। इसलिए मैं इसको शराब भी कहता हूं। तुम जागोगे भी और डोलोगे भी।
मगर डोलना अगर बेहोशी में हो, तो कुछ मजा न रहा। वह तो नींद का डोलना है। जागकर डोलो। होश से भरे नाचो। होश भी हो और नाच भी हो। होश भी हो और रसधार भी बहे। भीतर होश का दीया जले और बाहर मस्ती हो।
मैं चाहता हूं तुम ऐसे संन्यासी हो जाओ कि जिसके भीतर बुद्ध जैसा दीया जलता हो और जिसके बाहर मीरा जैसी मस्ती हो। तुम ऐसा जोड़ बनो। इस जोड़ पर कोशिश नहीं की गयी है। यह जोड़ अब तक संभव नहीं हुआ है। इसलिए अतीत में संन्यास अधूरा— अधूरा रह गया है; आधा—आधा रह गया है। पूरा संन्यासी होश से भरा होगा और मदमस्त भी होगा। दीया भी जला होगा ध्यान का और प्रेम की धारा भी बहती होगी।
पूर्ण संन्यासी बनो। एक अपूर्व अवसर तुम्हें मिला है, इसे चूकना मत। चूकने की संभावना सदा ज्यादा है। अगर न चूके तो तुम कुछ ऐसा जान लोगे, तुम कुछ ऐसे हो जाओगे, जैसा कि इसके पहले संभव नहीं था।
एकांगी ढंग के संन्यासी हुए हैं। स्थली ढंग का संन्यास भी सुंदर है। संसार से तो बहुत सुंदर है। लेकिन बहुआयामी संन्यास के सामने फीका है। जैसे हीरे पर देखा न, बहुत पहलू होते हैं। जितने पहलू होते हैं, उतनी हीरे की चमक बढ़ती जाती है। ऐसे ही जितने तुम्हारे संन्यास में पहलू होंगे, उतनी चमक बढ़ती जाएगी, उतनी गरिमा बढ़ती जाएगी। उतनी ही तुमसे ज्यादा किरणें प्रगट होंगी।
और ये दो पहलू तो होने ही चाहिए कि तुम्हारे भीतर होश का दीया हो, और तुम्हारे भीतर होश के दीए के साथ—साथ मस्ती की लहर हो। होश का दीया ऐसा न हो कि तुम्हें सुखा जाए, रेगिस्तान बना जाए।
तुममें फूल भी खिले। और तुममें फूल ही खिले, इतना ही नहीं है। क्योंकि अगर फूल ही खिले और भीतर बेहोशी रहे, तो मजा न रहा। भीतर दीए की ज्योति भी फूलों पर पड़ती हो।
फूल अंधेरे में खिले, तो मजा नहीं है। और दीया रेगिस्तान में जले, तो मजा नहीं है। बगिया में जले दीया। फूल भी खिले और दीए में दिखॉयी भी पड़े। मस्ती भी हो और होश में मस्ती दिखायी भी पड़ती रहे। मस्ती बेहोश न हो। और होश गैर—मस्त न हो।
इस नए संन्यास को ही जन्म दे रहा हूं। तुम एक महान प्रयोग में सहभागी हो रहे हो। तुम्हें शायद पता हो अपने सौभाग्य का या न पता हो।

Wednesday, 11 March 2015

यहां सारी चेष्टा यही चल रही है कि अब तुम अपना और न बनाओ। अपना बनाना यानी मोह, मेरे का विस्तार। मैं तुम्हें कोई तरह से भी सहयोगी नहीं हो सकता अपने को बढ़ाने में।
काफी दुख नहीं झेल लिया है अपनों से! अब तो छोड़ो। मुझसे तुम इस तरह का संबंध बनाओ, जिसमें मेरा—तेरा हो ही नहीं। नहीं तो वह संबंध भी सांसारिक हो जाएगा। जहां मेरा आया, वहा संसार आया।
क्या तुम बिना मेरे—तेरे को उठाए संबंध नहीं बना सकते? क्या यह संबंध मेरे—तेरे की भीड़ से मुक्त नहीं हो सकता? तुम वहा, मैं यहां; क्या बीच में मेरे—तेरे का शोरगुल होना ही चाहिए? सन्नाटे में यह बात नहीं हो सकेगी?
तुम शून्य बनो—बजाय मेरे का फैलाव करने के—तो तुम मुझसे जुडोगे। मैं शून्य हूं; तुम शून्य बनो, तो तुम मुझसे जुड़ोगे। मैंने मेरे का भाव छोड़ा है, तुम भी मेरे का भाव छोडो, तो मुझसे जुडोगे। मुझसे जुड्ने का एक ही उपाय है. मुझ जैसे हो जाओ, तो मुझसे जुडोगे।
अब तुम कहते हो कि ‘तुम्हें अपना बनाना चाहता हूं।’
तुमने कितने दरवाजों पर दस्तक दी! कितने लोगों को अपना बनाना चाहा! सब जगह से ठोकर खाकर लौटे; सब जगह से अपमानित हुए; अभी भी होश नहीं आया? फिर वही पुराना राग?
लोग विषय बदल लेते हैं, गीत वही गाए चले जाते हैं! लोग वाद्य बदल लेते हैं, सुर वही उठाए चले जाते हैं। कभी कहते हैं : मेरा धन। कभी कहते हैं. मेरा मकान। फिर कभी कहने लगते हैं. मेरा गुरु; मेरा भगवान; कि मेरा मोक्ष, कि मेरा शास्त्र! क्या फर्क पड़ता है, तुम मेरा शास्त्र कहो कि मेरी दुकान कहो, सब बराबर है। जहां मेरा है, वहा दुकान है। और इसीलिए तो मंदिरों पर भी झगड़े हो जाते हैं, क्योंकि जहां मेरा है, वहां झगड़ा है। जहां मेरा है, वहां उपद्रव है।

Tuesday, 10 March 2015

नुष्‍य शून्य होने की बजाय दुख से भरा होना ज्यादा पसंद करता है।
भरा होना ज्यादा पसंद करता है। खाली होने से भयभीत है। चाहे फिर दुख से ही क्यों न भरा हो। सुख न मिले, तो कोई बात नहीं है। दुख ही सही। लेकिन कुछ पकड़ने को चाहिए। कोई सहारा चाहिए।
दुख भी न हो, तो तुम शून्य में खोने लगोगे। सुख का किनारा तो दूर मालूम पड़ता है, दुख का किनारा पास। वहीं तुम खड़े हो। जो पास है, उसी को पकड़ लेते हो कि कहीं खो न जाओ। कहीं इस अपार में लीन न हो जाओ!
कहते हैं न. डूबते को तिनके का सहारा। दुख तुम्हारा तिनका है।
बचाने योग्य कुछ भी नहीं है। दुख ही पा रहे हो। लेकिन कुछ तो पा रहे हो! ना—कुछ। से कुछ सदा बेहतर! इसलिए जान—जानकर भी आदमी दुख को पकड़ तुम जरा उस दिन की बात सोचो, जब तुम्हारे भीतर कोई दुख न बचे, कोई चिंता न हो—तुम घबड़ा जाओगे। तुम सह न पाओगे। तुम उद्विग्न हो उठोगे। तुम बेचैन हो जाओगे। तुम कोई न कोई दुख रच लोगे। तुम जल्दी ही कोई दुख पैदा कर लोगे। अगर वास्तविक न होगा, तो काल्पनिक पैदा कर लोगे। बिना दुख के तुम न रह सकोगे।
इसलिए भी कि बिना दुख के तुम होते ही नहीं। मैं ही दुख पर जीता है। जहां दुख गया, मैं गया। अहंकार दुख का भोजन करता है। दुख ही अहंकार में खून बनकर बहता है। हड्डी—मांस—मज्जा बनता है। जहां दुख नहीं, वहां तुम नहीं। इसलिए भी तुम दुख को पकड़ते हो कि इसी के सहारे तो तुम हो।
तुमने कभी खयाल किया तुम अपने दुखों को बढ़ा—चढ़ाकर कहते हो! जितने होते हैं, उनसे बहुत बड़ा करके कहते हो। क्यों? दुख को बढाकर कहने में क्या सुख होता होगा?
एक सुख होता है कि बड़े दुख के साथ अहंकार बड़ा होता है। छोटी—मोटी बीमारियां छोटे —मोटे लोगों को होती हैं। बड़ी बीमारियां बड़े लोगों को होती हैं! छोटे—मोटे दुख, दो कौड़ी के दुख कोई भी भोग लेता है। तुम महंगे दुख भोगते हो। तुम्हारे दुख बहुत बड़े हैं। तुम दुखों का पहाड़ ढोते हो। तुम कोई छोटे—मोटे दुख से नहीं दबे हो। तुम पर सारी दुनिया की चिंताओं का बोझ है।
तुम अपने दुखों को बड़ा करके बताते हो। तुम बढ़ा—चढ़ाकर बात करते हो। ओर कोई तुम्हारे दुख को छोटा करने की कोशिश करे, तो तुम उससे नाराज होते हो। तुम उसे कभी क्षमा नहीं करते!
आदमी बहुत अदभुत है। तुम अपने दुख की कथा कह रहे हो और कोई उदास होकर सुने, या उपेक्षा करे, तो तुम्हें चोट लगती है, कि मैं अपने दुख कह रहा हूं और तुम सुन नहीं रहे हो! तुम्हें चोट इस बात से लगती है कि तुम मेरे अहंकार को स्वीकार नहीं कर रहे हो! मैं इतने दुखों से दबा जा रहा हूं; तुम्हें इतनी भी फुर्सत नहीं?
दुख के द्वारा तुम दूसरों का ध्यान आकर्षित करते हो। और अक्सर यह तरकीब मन में बैठ जाती है—गहरी बैठ जाती है—कि दुख से ध्यान आकर्षित होता है। बचपन से ही सीख लेते हैं। 

Monday, 9 March 2015

गुरु का अर्थ ही यही है कि वह तुम्हें तलाशे। जब तुम्हें जरूरत हो, तब उसका हाथ पहुंच ही जाना चाहिए। तुम्हारी जरूरत हो और उसका हाथ न पहुंचे, तो फिर गुरु गुरु नहीं है। तुम कितने ही दूर होओ, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। तुम हजारों मील दूर होओ, इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता। जब तुम्हारी वास्तविक जरूरत होगी, गुरु का हाथ तुम्हारे पास पहुंचेगा ही। पहुंचना ही चाहिए। वही तो अनुबंध है—शिष्य और गुरु के बीच। वही तो गांठ है—शिष्य और गुरु के बीच। वही तो सगाई है—शिष्य और गुरु के बीच।

बुद्ध ने दो तरह की समाधि कही है. समथ समाधि और विपस्सना समाधि। समथ समाधि का अर्थ होता है लौकिक समाधि। और विपस्सना समाधि का अर्थ होता है अलौकिक समाधि। समथ समाधि का अर्थ होता है संकल्प से पायी गयी समाधि—योग से, विधि से, विधान से, चेष्टा से, यत्न से। और विपस्सना का अर्थ होता है. सहज समाधि। चेष्टा से नहीं, यत्न से नहीं, योग से नहीं, विधि से नहीं—बोध से, सिर्फ समझ से। विपस्सना शब्द का अर्थ होता है अंतर्दृष्टि।
फर्क समझना। तुमने सुना कि क्रोध बुरा है। तो तुमने क्रोध को रोक लिया। अब तुम क्रोध नहीं करते हो। तो तुम्हारे चेहरे पर एक तरह की शाति आ जाएगी। लेकिन चेहरे पर ही। भीतर तो क्रोध कहीं पड़ा ही रहेगा। क्योंकि तुमने दबा दिया है सुनकर। अगर तुम्हारी समझ में आ गया कि क्रोध गलत है—शास्त्र कहते हैं, इसलिए नहीं, बुद्ध कहते हैं, इसलिए नहीं, मैं कहता हूं इसलिए नहीं—तुमने जाना अपने जीवंत अनुभव से, बार—बार क्रोध करके कि क्रोध व्यर्थ है। यह प्रतीति तुम्हारी गहन हो गयी, इतनी गहन हो गयी कि इस प्रतीति के कारण ही क्रोध असंभव हो गया, तुम्हें दबाना न पड़ा। तुम्हें विधि—विधान न करना पड़ा। तुम्हें अनुशासन आरोपित न करना पड़ा। तो दूसरी दशा घटेगी। तब तुम्हारे भीतर भी शांति होगी, बाहर भी शाति होगी।
समथ समाधि में बाहर से तो सब हो जाता है, भीतर कुछ चूक जाता है। विपस्सना समाधि पूरी समाधि है। बाहर भीतर एक जैसा होता है, एकरस हो जाता है।
इसलिए पहली को बुद्ध ने लौकिक कहा, दूसरी को अलौकिक। पहली से तुम ब्राह्मण तक नहीं पहुंच पाओगे। पहली से क्षत्रिय तक। संकल्प; जूझते हुए; लड़ते हुए; प्रयास से। दूसरी से तुम ब्राह्मण होओगे। प्रसाद से।
इसलिए बुद्ध ने कहा जो दो धर्मों को जान लेता, समथ और विपस्सना, वह पहुंच गया।
पहले आदमी को समथ से जाना पड़ता है। फिर समथ की हार पर विपस्सना का जन्म होता है।
ऐसा ही बुद्ध को हुआ। छह वर्ष तक उन्होंने जो साधा, वह समथ समाधि थी। फिर छह वर्ष के बाद, उस आखिरी रात जो घटा, वह विपस्सना समाधि थी।