Wednesday, 1 July 2015

ईथरिक बॉडी के बाद तीसरा शरीर है, जिसे हमने एस्ट्रल बॉडी, सूक्ष्म शरीर कहा। वह ईथर का भी सूक्ष्मतम रूप है। अभी विज्ञान उस पर नहीं पहुंचा है। अभी विज्ञान इस खयाल पर तो पहुंच गया है कि अगर पदार्थ को हम विश्लेषण करें, एनालिसिस करें और तोड़ते चले जाएं, तो अंत में ऊर्जा बचती है। उस ऊर्जा को हम ईथर कह रहे हैं। अगर ईथर को भी तोड़ा जा सके और उसके भी सूक्ष्मतम अंश बनाए जा सकें, तो जो बचेगा वह एस्ट्रल है—सूक्ष्म शरीर है वह। वह सूक्ष्म का भी सूक्ष्म रूप है।
अभी विज्ञान वहा नहीं पहुंचा, लेकिन पहुंच जाएगा। क्योंकि कल वह भौतिक को स्वीकार करता था, आणविक को स्वीकार नहीं करता था। कल वह कहता था पदार्थ ठोस चीज है; आज वह कहता है. ठोस जैसी कोई चीज ही नहीं है; जो भी है, सब गैर—ठोस है, नॉन—सालिड हो गया सब। यह दीवाल भी जो हमें इतनी ठोस दिखाई पड़ रही है, ठोस नहीं है; यह भी पोरस है, इसमें भी छेद हैं, और चीजें इसके आर—पार जा रही हैं। फिर भी हम कहेंगे कि छेदों के आसपास, जिनके बीच छेद हैं, वे तो कम से कम ठोस अणु होंगे! वे भी ठोस अणु नहीं हैं। एक—एक अणु भी पोरस है। अगर हम एक अणु को बड़ा कर सकें तो जमीन और चांद और तारे और सूरज के बीच जितना फासला है, उतना अणु के कणों के बीच फासला है। अगर उसको इतना बड़ा कर सकें तो फासला इतना ही हो जाएगा।
फिर वे जो फासले को भी जोड़नेवाले अणु हैं, हम कहेंगे, कम से कम वे तो ठोस हैं! लेकिन विज्ञान कहता है, वे भी ठोस नहीं हैं, वे सिर्फ विद्युत कण हैं। कण भी अब विज्ञान मानने को राजी नहीं है; क्योंकि कण के साथ पदार्थ का पुराना खयाल जुड़ा हुआ है। कण का मतलब होता है. पदार्थ का टुकड़ा। वे कण भी नहीं हैं, क्योंकि कण तो एक जैसा रहता है। वे पूरे वक्त बदलते रहते हैं। लहर की तरह हैं, कण की तरह नहीं। जैसे पानी में एक लहर उठी, जब तक आपने कहा कि लहर उठी, तब तक वह कुछ और हो गई। जब आपने कहा, वह रही लहर! तब तक वह कुछ और हो गई। क्योंकि लहर का मतलब ही यह है कि वह आ रही है, जा रही है। लेकिन अगर हम लहर भी कहें तो भी पानी की लहर एक भौतिक घटना है।
इसलिए विज्ञान ने एक नया शब्द खोजा है, जो कि कभी था नहीं आज से तीस साल पहले, वह है कांटा। अभी हिंदी में उस शब्द के लिए कहना मुश्किल है। इसलिए कहना मुश्किल है, जैसे हिंदी के पास शब्द है ब्रह्म और अंग्रेजी में कहना मुश्किल है; क्योंकि कभी जरूरत पड़ गई थी कुछ अनुभव करनेवाले लोगों को, तब यह शब्द खोज लिया गया था। पश्चिम उस जगह नहीं पहुंचा कभी, इसलिए इस शब्द की उन्हें कभी जरूरत नहीं पड़ी। इसलिए धर्म की बहुत सी भाषा के शब्द पश्चिम को सीधे लेना पड़ते हैं—जैसे ओम्। उसका कोई अनुवाद दुनिया की किसी भाषा में नहीं हो सकता। वह कभी किन्हीं आध्यात्मिक गहराइयों में अनुभव की गई बात है। उसके लिए हमने एक शब्द खोज लिया था। लेकिन पश्चिम के पास उसके लिए कोई समांतर शब्द नहीं है कि उसका अनुवाद किया जा सके।
ऐसे ही ‘कांटा’ पश्चिम के विज्ञान की बहुत ऊंचाई पर पाया गया शब्द है जिसके लिए दूसरी भाषा में कोई शब्द नहीं है। कांटा का अगर हम मतलब समझना चाहें, तो कांटा का मतलब होता है. कण और तरंग एक साथ। इसको कसीव करना मुश्किल हो जाएगा। कोई चीज कण और तरंग एक साथ! कभी वह तरंग की तरह व्यवहार करता है और कभी कण की तरह व्यवहार करता है— और कोई भरोसा नहीं उसका कि वह वैसा व्यवहार करे।

Tuesday, 30 June 2015

तो जब पूरे सात शरीरों को हम समझेंगे, तब पहले और दूसरे शरीर में जोड़ बनता है। क्योंकि पहला शरीर है भौतिक शरीर, फिजिकल बॉडी, दूसरा शरीर है ईथरिक बॉडी, ईथर, भाव शरीर। वह भौतिक का ही सूक्ष्मतम रूप है। वह अभौतिक नहीं है, वह भौतिक का ही सूक्ष्मतम रूप है—इतना सूक्ष्मतम कि भौतिक उपाय भी उसे पकड़ने में अभी ठीक से समर्थ नहीं हो पाते। लेकिन अब भौतिकवादी इस बात को इनकार नहीं करता है कि भौतिक का सूक्ष्मतम रूप करीब—करीब अभौतिक हो जाता है। अब जैसे आज विज्ञान कहता है कि अगर हम पदार्थ को तोड़ते चले जाएं तो जो अंतिम, पदार्थ के विश्लेषण पर हमें मिलेंगे—इलेक्ट्रान, वे अभौतिक हो गए, वे इम्मैटीरियल हो गए हैं; क्योंकि वे सिर्फ विद्युत के कण हैं, उनमें पदार्थ और सब्सटेंस जैसा कुछ भी नहीं बचा, सिर्फ एनर्जी और ऊर्जा बच रही है। इसलिए बड़ी अदभुत घटना घटी है पिछले तीस वर्षों में कि जो विज्ञान यह बात स्वीकार करके चला था कि पदार्थ ही सत्य है, वह विज्ञान इस नतीजे पर पहुंचा है कि पदार्थ तो बिलकुल है ही नहीं, एनर्जी और ऊर्जा ही सत्य है, और पदार्थ जो है वह एनर्जी का, ऊर्जा का तीव्र घूमता हुआ रूप है, इसलिए भ्रम पैदा हो रहा है।
एक पंखा हमारे ऊपर चल रहा है। यह पंखा इतने जोर से चलाया जा सकता है कि इसकी तीन पंखुड़ियां हमें दिखाई पडनी बंद हो जाएं। और जब इसकी तीन पंखुड़ियां हमें दिखाई पड़नी बंद हो जाएंगी, तो पंखा पंखुड़ियां न मालूम होकर, टीन का एक गोल चक्कर घूम रहा है, ऐसा मालूम होगा। और तीनों पंखुड़ियों के बीच की जो खाली जगह है वह भर जाएगी, वह खाली नहीं रह जाएगी; क्योंकि तीन पंखुड़ियां दिखाई नहीं पड़ेगी।
असल में, पंखुड़ियां इतनी तेजी से घूम सकती हैं कि इसके पहले कि एक पंखुड़ी हटे एक जगह से और हमारी आंख से उसका प्रतिबिंब मिटे, उसके पहले दूसरी पंखुड़ी उसकी जगह आ जाती है; प्रतिबिंब पहला बना रहता है और दूसरा उसके ऊपर आ जाता है। इसलिए बीच की जो खाली जगह है वह हमें दिखाई नहीं पड़ती। यह पंखा इतनी तेजी से भी घुमाया जा सकता है कि आप इसके ऊपर मजे से बैठ सकें और आपको पता न चले कि नीचे कोई चीज बदल रही है। अगर दो पंखुडियों के बीच की खाली जगह इतनी तेजी से भर जाए कि एक पंखुड़ी आपके नीचे से हटे, आप इसके पहले कि खाली जगह में से गिरे, दूसरी पंखुड़ी आपको सम्हाल ले, तो आपको दो पंखुड़ियों के बीच का अंतर पता नहीं चलेगा। यह गति की बात है।
अगर ऊर्जा तीव्र गति से घूमती है तो हमें पदार्थ मालूम होती है। इसलिए वैज्ञानिक आज जिस एटामिक एनर्जी पर सारा का सारा विस्तार कर रहा है, उस एनर्जी को किसी ने देखा नहीं है, सिर्फ उसके इफेक्ट्स, उसके परिणाम भर देखे हैं। वह मूल अणु की शक्ति किसी ने देखी नहीं है, और कोई कभी देखेगा भी, यह भी अब सवाल नहीं है। लेकिन उसके परिणाम दिखाई पड़ते हैं।
ईथरिक बॉडी को अगर हम यह भी कहें कि वह मूल एटामिक बॉडी है, तो कोई हर्ज नहीं है। उसके परिणाम दिखाई पड़ते हैं। ईथरिक बॉडी को किसी ने देखा नहीं है, सिर्फ उसके परिणाम दिखाई पड़ते हैं। लेकिन उन परिणामों की वजह से वह है, यह स्वीकार कर लेने की जरूरत पड़ जाती है। यह जो दूसरा शरीर है, यह पहले भौतिक शरीर का ही सूक्ष्मतम रूप है; इसलिए इन दोनों के बीच कोई सीढ़ी बनाने में कठिनाई नहीं है। ये दोनों एक तरह से जुड़े ही हुए हैं—एक स्थूल है जो दिखाई पड जाता है, दूसरा सूक्ष्म है इसलिए दिखाई नहीं पड़ता।

Monday, 29 June 2015

क तो जिसे हम शरीर कहते हैं और जिसे हम आत्मा कहते हैं, ये ऐसी दो चीजें नहीं हैं कि जिनके बीच सेतु न बनता हो, ब्रिज न बनता हो। इनके बीच कोई खाई नहीं है, इनके बीच जोड़ है।
तो सदा से एक खयाल था कि शरीर अलग है, आत्मा अलग है; और ये दोनों इस भांति अलग हैं कि इन दोनों के बीच कोई सेतु, कोई ब्रिज नहीं बन सकता। न केवल अलग हैं, बल्कि विपरीत हैं एक—दूसरे से। इस खयाल ने धर्म और विज्ञान को अलग कर दिया था। धर्म वह था, जो शरीर के अतिरिक्त जो है उसकी खोज करे, और विज्ञान वह था, जो शरीर की खोज करे— आत्मा के अतिरिक्त जो है, उसकी खोज करे।
स्वभावत:, दोनों तरह की खोज एक को मानती और दूसरे को इनकार करती रही, क्योंकि विज्ञान जिसे खोजता था, उसे वह कहता था शरीर है, आत्मा कहां! और धर्म जिसे खोजता था, उसे वह मानता था : आत्मा है, शरीर कहां!
तो धर्म जब अपनी पूरी ऊंचाइयों पर पहुंचा तो उसने शरीर को इल्‍यूजन और माया कह दिया, कि वह है ही नहीं; आत्मा ही सत्य है, शरीर भ्रम है। और विज्ञान जब अपनी ऊंचाइयों पर पहुंचा तो उसने कह दिया कि आत्मा तो एक झूठ, एक असत्य है, शरीर ही सब कुछ है। यह भ्रांति आत्मा और शरीर को अनिवार्य रूप से विरोधी तत्वों की तरह मानने से हुई।
अब मैंने सात शरीरों की बात कही। ये सात शरीर….. अगर पहला शरीर हम भौतिक शरीर मान लें और अंतिम शरीर आत्मिक मान लें, और बीच के पांच शरीरों को छोड़ दें, तो इनके बीच सेतु नहीं बन सकेगा। ऐसे ही जैसे जिन सीढ़ियों से चढ़कर आप आए हैं, ऊपर की सीढ़ी बचा लें और पहली सीढ़ी बचा लें नीचे की, और बीच की सीढ़ियों को छोड़ दें, तो आपको लगेगा कि पहली सीढ़ी कहां और दूसरी सीढ़ी कहां! बीच में खाई हो जाएगी। अगर आप सारी सीढ़ियों को देखें तो पहली सीढ़ी भी आखिरी सीढ़ी से जुड़ी है। और अगर ठीक से देखें तो आखिरी सीढ़ी पहली सीढ़ी का ही आखिरी हिस्सा है; और पहली सीढ़ी आखिरी सीढी का पहला हिस्सा है।

Sunday, 28 June 2015

हर आदमी कहता है, बचपन में दुख नहीं था। अगर लौट सकता हो आदमी, फौरन लौट जाए। वह तो लौट नहीं सकता है, इसलिए रुका रह जाता है। कहता है बचपन में दुख नहीं था। अगर उसका वश चले तो वह कहे कि मां के गर्भ में बिलकुल दुख नहीं था। अगर लौट सके तो लौट जाए, लेकिन लौट नहीं सकता। फिर आगे बढ़ता जाता है। लेकिन जीवन के चुनाव में हम पीछे लौट सकते हैं। हम मूर्च्छा में लौट सकते हैं। हम तरकीबें खोज सकते हैं कि हम मूर्च्छित हो जाएं।
और वह जो दूर से आवाजें आती हैं, उन आवाजों के शब्द भी हमारी समझ में नहीं आते। क्योंकि आनंद हम जानते नहीं कि किस चीज का नाम है! कौन —सी चिड़िया है जिसको आनंद कहें! दुख हम जानते हैं, अच्छी तरह जानते हैं। और हम यह भी जानते हैं कि जितना सुख पाने की कोशिश की, उतना दुख पाया। अब यह भी डर लगता है कि आनंद पाने की कोशिश में कहीं और झंझट में न पड़ जाएं। जितना सुख पाने की कोशिश की उतना दुख पाया, तो यह आनंद हमें सुख का निकटतम मालूम पड़ता है कि कुछ सुख की ही गहन अनुभूति होगी। मगर झंझट से भी डरते हैं, क्योंकि सुख पाने की जितनी कोशिश की उतना दुख पाया, कहीं आनंद पाने की कोशिश में और भी मुसीबत न हो जाए, कहीं कोई महा दुख न मिल जाए। इसलिए सुन लेते हैं, हाथ जोड़ कर नमस्कार कर लेते हैं। उस पार के लोगों को कहते हैं, तुम भगवान हो, तुम अवतार हो, तीर्थंकर हो, बड़े अच्छे हो। हम तुम्हारी पूजा करेंगे, लेकिन हमें पीछे लौटना है।
अज्ञात का भय मालूम पड़ता है। जो थोड़े —बहुत सुख हमने जमा रखे हैं, कहीं वे भी न छूट जाएं। वे सब छूटते मालूम पड़ते हैं आगे बढ़ो तो। क्योंकि हमने उसी सेतु पर जो कि सिर्फ पार होने के लिए था, घर बना लिया है, वहीं रहने लगे हैं। वहीं हमने सब इंतजाम कर लिया है। अपना बैठकखाना जमा लिया है उसी सेतु पर। अब कोई हमें कहता है, आगे आ जाओ, तो हमें डर लगता है कि इस सब का क्या होगा! यह सब छोड़ कर जाना पड़ेगा आगे! तो हम कहते हैं, जरा वक्त आने दो, बूढ़े होने दो, मौत करीब आने दो। जब यह सब छूटने लगेगा, तब हम एकदम से आ जाएंगे, क्योंकि फिर कोई डर नहीं रहेगा।
लेकिन जितनी मौत करीब आती है, उतनी पकड़ गहरी होती है। क्योंकि जितनी मौत करीब आती है उतना डर लगता है कि छूट न जाए, तो मुट्ठी जोर से कसते हैं। इसलिए बूढ़ा आदमी निपट कृपण हो जाता है, जवान आदमी उतना कृपण नहीं होता। उसकी कृपणता बढ़ जाती है बूढ़े की सब तरफ से। वह एकदम जोर से पकड़ता है। वह कहता है, अब जाने का वक्त हुआ, कहीं सब छूट न जाए। अगर ढीला पड़ा, कहीं हाथ न छूट जाए, इसलिए जोर से पकड़ लेता है। यह जोर की पकड़ ही बूढे आदमी को कुरूप कर जाती है, अन्यथा बूढ़े आदमी के सौंदर्य का कोई मुकाबला न हो। हम सुंदर बच्चे जानते हैं, फिर उनसे कम सुंदर जवान जानते हैं, और सुंदर के तो बहुत कम हैं। कभी—कभी घटना घटती है। क्योंकि जैसे—जैसे कृपणता बढ़ती है और पकड़ बढ़ती है, वैसे —वैसे सब कुरूप होता जाता है।
खुले हाथ सुंदर हैं, बंधी हुई मुट्ठी कुरूप हो जाती है। मुक्ति सौंदर्य है और बंधन गुलामी। सोचता तो है कि छोड़ देंगे कल, जब मौका छोड़ने के लिए आ जाएगा तब छोड़ देंगे। लेकिन जो आदमी उस
मौके की प्रतीक्षा करता है कि वह जब उससे छीना जायेगा तब छोड़ेगा, वह आदमी छोड़ना ही नहीं चाहता। और जब छीना जाता है तब पीड़ा आती है, और जब छोडा जाता है तो पीड़ा नहीं आती।
अब यह जो आगे बढ़ने का मामला है, यह चुनाव ही है हमारा। और इस चुनाव के लिए गति दी जा सकती है। इसके भी नियम हैं। सेतु तैयार है। वह भी प्राकृतिक है। मेरी बात खयाल में आ रही है न? आगे जाने के लिए भी सेतु तैयार है, वह कहता है, आओ। यह भी प्रकृति है। पीछे जाने के लिए भी तैयार है। वह कहता है, आओ। यह भी प्रकृति है। प्रकृति तुम्हें हर हालत में स्वागत करने को तैयार है। उसके सब दरवाजे पर वेलकम लिखा हुआ है। यही खतरा भी है। यानी किसी दरवाजे पर यह नहीं लिखा हुआ है कि मत आओ। सब दरवाजे पर, द्वार—द्वार पर—स्वागतम।
इसलिए चुनाव तुम्हारे हाथ में है। और यह प्रकृति की अनुकंपा ही है कि किसी भी द्वार पर तुम्हें इनकार नहीं है, तुम जहां आना चाहो, आ जाओ। मगर नरक के द्वार पर भी लगा हुआ है, स्वर्ग के द्वार पर भी लगा हुआ है। चुनाव अंततः हमारा होगा कि हमने कौन—सा स्वागतम चुना। इसमें हम प्रकृति को जिम्मेवार नहीं ठहरा सकेंगे कि तुमने स्वागतम क्यों लगाया? उसने तो सभी जगह लगा दिया था, उसमें कोई सवाल ही नहीं था, उसने कहीं भी रुकावट न डाली थी।
स्वतंत्रता इस का अर्थ है, स्वागतम का। यानी प्रकृति जो है, वह परम स्वतंत्र है भीतर से। और हम उसके हिस्से हैं, हम परम स्वतंत्र हैं। हम जो करना चाहते हैं, कर रहे हैं। इस करने में सब चीजों में उसका सहारा है। लेकिन चुनाव हमारा ही है। और जब मैं कहता हूं, हमारा ही, तो भ्रांति में मत पड़ जाना। क्योंकि हम भी प्रकृति के हिस्से ही हैं।
अगर इसे परम शब्दों में कहा जाए तो मतलब यह होगा कि प्रकृति की ही अनंत संभावनाएं हैं, प्रकृति के ही अनंत द्वार हैं, प्रकृति ही अपने अनंत द्वारों पर अपने ही अनंत अंशों से खोजती है, चुनती है, भटकती है, पहुंचती है। पर यह बहुत गोल हो जाता है। यह बात जो है बहुत गोल हो जाती है, इसमें कोने नहीं रह जाते।
और कठिनाई यह है कि प्रकृति के सब रास्ते गोल हैं, सरकुलर हैं। उसका कोई भी रास्ता कोने वाला नहीं है। चौखटा कोई रास्ता नहीं है उसका। उसके सब तारे, चांद, ग्रह, उपग्रह, गोल हैं। उन चांद—तारों की परिक्रमाएं गोल हैं। प्रकृति की सारी नियम —व्यवस्था वर्तुलाकार है।
इसलिए बहुत से धार्मिक प्रतीकों में वर्तुल का प्रयोग हुआ है, सर्किल का प्रयोग हुआ है। वह गोल है। और तुम कहीं से भी चलो, कहीं से भी चलकर कहीं भी पहुंच सकते हो। चुनाव सदा तुम्हारा है।

Saturday, 27 June 2015

इस जगत में जो भी घटता है वह प्राकृतिक ही होता है। अप्राकृतिक के होने का कोई उपाय ही नहीं है। जो भी होता है वह प्राकृतिक होता है। और मनुष्य अगर आध्यात्मिक विकास कर रहा है, तो वह उसकी प्रकृति की संभावना है। अगर छलांग लगा रहा है, तो प्रकृति की संभावना है। लेकिन चुनाव भी प्रकृति की संभावना है कि वह छलांग लगाने की दिशा में चले या छलांग न लगाने की दिशा में चले। वह भी प्राकृतिक संभावना है। इसका मतलब यह हुआ कि प्रकृति में अनंत संभावनाएं हैं, मल्टी पोटेशियलिटीज हैं। असल में जब हम प्रकृति शब्द का उपयोग करते हैं, तो हमें लगता है कि एक संभावना है। उससे भूल हो जाती है।
प्रकृति है अनंत संभावनाओं का संघट। इसमें सौ डिग्री पर पानी गरम होता है, यह भी प्राकृतिक घटना है। और शून्य डिग्री के नीचे बर्फ बनती है, यह भी प्राकृतिक घटना है। इसमें सौ डिग्री पर गरम होकर भाप बनने वाली प्राकृतिक घटना का खंडन नहीं होता, शून्य डिग्री पर बर्फ बनने वाली घटना से। एक प्राकृतिक, एक अप्राकृतिक, ऐसा नहीं है; दोनों प्राकृतिक हैं। इसमें ऊपर भी प्राकृतिक है, इसमें प्रकाश भी प्राकृतिक है। इसमें नीचे उतरना भी प्राकृतिक है, इसमें ऊपर जाना भी प्राकृतिक है। इसमें अनंत संभावनाएं हैं। हम सदा एक चौराहे पर खड़े हैं, जिसके अनंत मार्ग हैं। और मजा यह है कि हम जो चुनाव करेंगे, हमारी चुनाव की क्षमता भी प्रकृति की ही दी हुई क्षमता है। लेकिन हम अगर गलत रास्ता चुनें तो प्रकृति हमें उस गलत रास्ते की पूर्णता तक पहुंचा देगी।
प्रकृति बड़ी सहयोगी है। अगर हम नरक का रास्ता चुनें, तो वह उसी को साफ करने लगेगी कि आओ। वह इनकार नहीं करेगी। अगर हमें पानी का बर्फ बनाना है, तो प्रकृति क्यों इनकार करेगी कि तुम भाप बनाओ; वह बर्फ बनाएगी। अगर आपको नरक जाना है, तो वह नरक का रास्ता साफ करने लगेगी। अगर आपको स्वर्ग जाना है, तो वह स्वर्ग का रास्ता साफ करने लगेगी। अगर आपको जीना है, तो जीने का रास्ता साफ करेगी। अगर आपको मरना है, तो मरने का रास्ता साफ करेगी।
जीना भी प्राकृतिक घटना है और मरना भी प्राकृतिक घटना है और आपकी चुनाव की क्षमता भी प्राकृतिक है। इसको अगर मल्टी डाशमेंशनल, प्रकृति का बहु आयामी होना समझ में आ जाए, तो कठिनाई नहीं रह जाएगी।
दुख भी प्राकृतिक है, सुख भी प्राकृतिक है। अंधे की तरह जीना भी प्राकृतिक है, आख खोलकर जीना भी प्राकृतिक है। जागना भी प्राकृतिक है, सोना भी प्राकृतिक है। प्रकृति में अनंत संभावनाएं हैं। और मजा यह है कि हम कोई प्रकृति से बाहर नहीं हैं, हम प्रकृति के हिस्से हैं। और चुनाव भी प्रकृति की क्षमता है। पर जितना चेतन होता जाता है व्यक्ति, उतनी चुनाव की क्षमता प्रगाढ़ होती जाती है। जितना अचेतन होता है, उतनी चुनाव की क्षमता प्रगाढ़ नहीं होती। जैसे पानी अगर धूप में रखा है और उसको भाप नहीं बनना है, ऐसा उपाय नहीं है उसके पास। वह कठिनाई में पड़ेगा। उसे बनना है कि नहीं बनना है, इसका निर्णय वह नहीं कर सकता है। अगर धूप में पड़ा है तो भाप बनेगा और अगर सर्दी में पड़ा है तो बर्फ बनेगा। यह उसे भोगना पड़ेगा। भोगने का भी उसे पता नहीं चलेगा, क्योंकि चेतना क्षीण है, या नहीं है, या सोई हुई है।
एक वृक्ष अफ्रीका का वृक्ष सैकड़ों फुट ऊपर चला जाएगा। वह धूप की तलाश कर रहा है। अफ्रीका का वृक्ष लंबा हो जाएगा। हिंदुस्तान का वृक्ष उतना लंबा नहीं होगा, क्योंकि उतने घने जंगल नहीं हैं। जब घना जंगल होता है तो वृक्ष को अपनी जिंदगी बचाने के लिए ऊंचाई—ऊंचाई—ऊंचाई खोजनी पड़ती है, ताकि दूसरे वृक्षों के पार जाकर वह सूरज की रोशनी ले सके। अगर वह नहीं खोजता ऊंचाई, तो मर जाएगा। वह उसकी जिंदगी का सवाल है।
तो वृक्ष थोड़ा—सा चुनाव कर रहा है। घना जंगल होगा, तो वृक्ष चौड़े कम होने लगेंगे, लंबे ज्यादा होने लगेंगे, कोनीकल हो जाएंगे। क्योंकि चौड़ा होना खतरनाक है, चौड़े में मर जाएंगे, इधर—उधर के वृक्षों में उलझ जाएंगी शाखाएं और सूरज तक पहुंच ही नहीं पाएंगे। अब सूरज तक पहुंचना है तो शाखाएं मत निकालो, अब तो एक ही पीड़ को लंबा करो। यह भी चुनाव है। यह भी वृक्ष चुन रहा है। इसी वृक्ष को अगर तुम ऐसे मुल्क में ले आओ जहां घने जंगल नहीं हैं, तो उसकी लंबाई कम हो जाएगी।
कुछ वृक्ष थोड़ा—बहुत सरकते भी हैं। साल में दस—पांच फीट सरक जाते हैं। उसका मतलब है, वह कुछ जड़ों को चलाते हैं पैरों की तरह। जिस तरफ उनको जाना है उस तरफ की जड़ों को मजबूत करके पकड़ लेते हैं, और जहां से छोड़ना है वहां की जड़ों को ढीला करके छोड़ देते हैं, तो थोड़ा सा सरक जाते हैं। दलदली जमीन हो तो उनको आसानी मिल जाती है। थोड़ा—सा सरकने लगते हैं।
कुछ वृक्ष और तरह की भी तैयारियां करते हैं, पक्षियों को लुभाते हैं, क्योंकि कुछ वृक्ष मांसाहारी हैं। तो पक्षियों को लुभाते हैं, फंसाते हैं और पक्षी आ जाएं, तो फौरन पत्ते बंद कर लेते हैं। और पक्षियों को लुभाने के उन्होंने बड़े इंतजाम किए हुए हैं। उनके ऊपर थालियों जैसे पत्ते होंगे। थालियों में बड़ा सुगंधित रस होगा। वह रस अपनी थालियों में भरे रहेंगे। स्वभावत: उनका रस दूर—दूर से सुगंध की वजह से पक्षियों को खींचेगा। पक्षी उस रस को पीने आकर बैठे नहीं कि चारों तरफ के पत्ते उस थाली पर बंद होकर पक्षी को दबा लेंगे। उसका खून पी जाएगा वृक्ष। अब नहीं कहा जा सकता कि यह चुनाव नहीं कर रहा है। यह चुनाव कर रहा है। यह अपनी तरफ से कुछ इंतजाम भी कर रहा है। यह अपनी तरफ से कुछ खोज भी कर रहा है।
पशु और भी ज्यादा चुनाव कर रहे हैं, भाग रहे हैं, दौड़ रहे हैं। लेकिन इन सबके चुनाव मनुष्य के चुनाव की दृष्टि से बहुत साधारण हैं।
मनुष्य के सामने और बड़े चुनाव हैं, क्योंकि उसकी चेतना और भी विकसित हो गई है। अब वह शरीर से ही नहीं चुनता है, अब वह मन से भी चुनता है। और अब वह जगत में पृथ्वी की यात्रा ही नहीं चुनता, पृथ्वी के ऊपर वर्टिकल यात्रा भी चुनता है। वह भी उसका चुनाव है। लेकिन है हाथ में सदा।
अब इस संबंध में अभी खोजबीन होनी बाकी है, लेकिन मुझे लगता है कि जिस दिन भी खोजबीन होगी, यह बात पाई जा सकेगी। कुछ वृक्ष हो सकते हैं, जो सुसाइडल हों, जो जीना न चुनें और जहां घना जंगल है, वहां भी छोटे रह जाएं और मर जाएं। अब यह खोजबीन होनी बाकी है। आदमी में तो हमें साफ दिखाई पड़ता है कि कुछ लोग सुसाइडल हैं। वे जीने को नहीं चुनते, मरने को चुनते रहते हैं। उनको जहां भी कांटा दिखाई पड़े, वह बिलकुल दीवाने की तरह काटे की तरफ जाते हैं। फूल दिखाई पड़े, तो उन्हें जंचते ही नहीं। उन्हें जहां हार दिखाई पड़े, वहा वह बिलकुल हिप्नोटाइज होकर सरकते हैं। जहां जीत दिखाई पड़े, वहा वे पच्चीस बहाने बनाते हैं। जहां विकास की संभावना हो, उसके खिलाफ वे हजार तर्क इकट्ठे कर लेते हैं। जहां पतन का सुनिश्चित विश्वास हो उनको, वहां वे बिलकुल बेधड़क बढ़े चले जाते हैं।
यह सब चुनाव है। और यह चुनाव जितना मनुष्य जागरूक होता चला जाएगा उतना ही यह चुनाव आनंद की ओर अग्रसर होने लगेगा। जितना मूर्च्छित होगा, उतना दुख की तरफ अग्रसर होता रहेगा।
तो जब मैं कहता हूं कि चुनना ही पड़ेगा। भाप बनने के उपाय हैं, लेकिन भाप की जगह तुम्हें
पहुंचना पड़ेगा। बर्फ बनने के उपाय हैं, बर्फ की जगह तुम्हें पहुंचना पड़ेगा। जिंदा रहने के उपाय हैं, लेकिन जिंदगी की व्यवस्था खोजनी पड़ेगी। मरने के उपाय हैं, मरने की व्यवस्था खोजनी पड़ेगी। चुनाव तुम्हारा है। और तुम और प्रकृति दो नहीं हो। तुम ही प्रकृति हो।
अब इसका मतलब हुआ कि प्रकृति की जो मल्टी—डायमेशनलिटी है, वह दो तरह की है। महावीर ने एक शब्द का प्रयोग किया है, वह समझने जैसा है। महावीर का एक शब्द है, अनंत अनंत—इनफिनिट इनफिनिटीज। यानी एक तो अनंत शब्द है हमारे पास। अनंत का मतलब होता है, एक दिशा में अनंत। अनंत अनंत का अर्थ होता है अनंत दिशाओं में अनंत। यानी ऐसा नहीं है कि दो दिशाओं पर ही अनंतता है, सभी दिशाओं में अनंतता है। सभी अनंतताओं में अनंतताएं हैं। तो यह जगत जो है इनफिनिट नहीं है, कहना चाहिए इनफिनिट इनफिनिटीज है।
तो यहां मैंने कहा कि एक तो अनंत दिशाएं हैं। और प्रकृति सबका मौका देती है। अनंत चुनाव हैं, उनका भी मौका देती है। और अनंत व्यक्ति हैं, जो प्रकृति के ही अनंत हिस्से हैं। और सबको अपना — अपना स्वतंत्र मौका है कि यह चुने या न चुने। और इन सबका नियोजन ऊपर से नहीं हो रहा है, इन सबका नियोजन भीतर से हो रहा है। यानी यह जो अनंतता है —कहना चाहिए, अनंत अनंतता है—यह भी इस तरह नहीं है जैसे कि एक बैल को कोई आदमी गले में रस्सी बांधकर आगे से खींच रहा हो। इस तरह नहीं है। या कोई उस बैल को पीछे से कोड़े मारकर किसी रास्ते पर धका रहा हो, इस तरह भी नहीं है। यह अनंत अनंतता इस तरह है, जैसे कोई झरना अपनी भीतरी ताकत से फूट पड़ा है और बह रहा है। न उसे कोई आगे से खींच रहा है, न उसे कोई कोड़े मार रहा है, न उसे कोई पुकार रहा है, न कोई उससे कह रहा है कि तुम जाओ। लेकिन उसमें शक्ति है, ऊर्जा है। और ऊर्जा क्या करे? ऊर्जा फूट रही है, ऊर्जा बह रही है। यह इनर एक्सपैंशन है।
अनंत आयाम, अनंत चुनाव, अनंत चुनाव करने वाले अंश और इन सबके ऊपर ऊपर से कोई नियोजन नहीं है, कोई ऊपर नियंता जैसा परमात्मा नहीं है। कोई ऊपर बैठकर मार्गदर्शन देने वाला प्रभु नहीं, कोई इंजीनियर नहीं, बल्कि भीतर की अनंत ऊर्जा ही एकमात्र आधार है, जिसके आधार पर सब फैलता जाता है।

Friday, 26 June 2015

तो मैं न केवल बीमारी के खिलाफ कह रहा हूं, मैं औषधि के भी खिलाफ कह रहा हूं। क्योंकि मेरा अनुभव यह है कि इधर हजारों साल में बीमारी के खिलाफ तो बहुत बातें कही गईं और तब बीमारी तो छूट गई पर औषधि पकड़ गई। और जिन लोगों ने औषधि को पकड़ा, वे बीमारों से भी ज्यादा खतरनाक सिद्ध हुए।
इसलिए दोनों ही बातें खयाल में रखनी जरूरी हैं। बीमारी छोड़नी है और औषधि भी छोड़नी है। मन छोड़ना है, ध्यान भी छोड़ना है। संसार छोड़ना है, धर्म भी छोड़ना है। और एक ऐसी जगह आ जाना है, जहां न कुछ छोड़ने को बचता है, न कुछ पकड़ने को बचता है। तब वही रह जाता है, जो है। और इसलिए यह सारी की सारी जिन प्रक्रियाओं की मैं बात करता हूं —चाहे कुंडलिनी की, चाहे चक्रों की, सप्त शरीरों की, यह सारा का सारा स्वप्न का ही हिस्सा है। लेकिन स्वप्न में तुम हो और जब तक तुम स्वप्न को ठीक से न समझ लो, तुम स्वप्न के बाहर नहीं आ सकते हो।
स्वप्न के बाहर आने के लिए भी स्वप्न को ठीक से समझ लेना जरूरी है। और स्वप्न का भी अपना अस्तित्व है, और झूठ का भी अपना अस्तित्व है। वह है जगत में। और उससे छूटने के लिए भी उपाय हैं। मगर दोनों ही अंततः छोड़ने योग्य हैं, इसलिए मैं कहता हूं कि दोनों ही असत्य हैं। अगर मैं इनमें से एक को सत्य कहूंगा, तो फिर तुम उसे छोड़ोगे कैसे? फिर तुम उसे छोड़ोगे नहीं। सत्य कहीं छोड़ा जाता है? सत्य तो सदा पकड़ा जाता है। इसलिए तुम कुछ भी न पकड़ पाओ, तुम्हारी कुछ भी क्लिगिंग न हो पाए, तुम कहीं भी किसी ग्रंथि में, किसी बंधन में न पड़ पाओ, इसलिए मैं कहता हूं कि न तो संसार सत्य है और न साधना सत्य है। संसार के असत्य को काटने के लिए साधना का असत्य है। जब दोनों असत्य समतल होकर कट जाते हैं तब जो शेष रह जाता है वह सत्य है। वह न संसार का है, न साधना का। वह दोनों के बाहर, या दोनों के पीछे, या दोनों के पार, या दोनों को अतिक्रमण करता हुआ है। जब दोनों नहीं रह जाएंगे।
इसलिए मैं एक तीसरे तरह के आदमी की तुमसे बात कर रहा हूं जो न संसारी है, न संन्यासी है। जब मुझे कोई पूछता है कि क्या आप संन्यासी हैं, तो मैं बड़ी मुश्किल में पड़ जाता हूं। क्योंकि अगर मैं अपने को संन्यासी कहूं, तो मैं उसी द्वंद्व के भीतर अपने को बांधता हूं जो संसारी और संन्यासी के बीच है। जब कोई पूछता है कि क्या आप संसारी हैं, तब भी मैं मुश्किल में पड़ जाता हूं। क्योंकि अगर मैं अपने को संसारी कहूं तो मैं फिर उसी द्वंद्व में खड़ा हो जाता हूं, जो संन्यासी और संसारी के बीच है। तो या तो मैं कहूं कि मैं दोनों हूं एक साथ, जो कि बिलकुल बेमानी हो जाता है, मीनिगलेस हो जाता है। क्योंकि अगर संसारी और संन्यासी दोनों हूं एक साथ, तो मतलब ही खो गया, क्योंकि मतलब द्वंद्व में था, मतलब विरोध में था। संसार छोड़ने का अर्थ संन्यास था, संन्यास न ग्रहण करने का अर्थ संसार था। अब अगर मैं कहूं कि दोनों ही हूं, तो शब्द अर्थ खो देते हैं। या कहूं? दोनों ही नहीं हूं, तब भी बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती है, क्योंकि दो के बाहर तीसरे का हमें कोई खयाल ही नहीं है कि कोई तीसरा भी हो सकता है। कहते हैं आप, यहां या वहां। या तो कहिए जिंदा हैं, या कहिए मर गए हैं। दोनों नहीं हैं, ऐसा कैसे चलेगा! ऐसा नहीं चल सकता। हम द्वंद्व में बांटकर, काटकर जीते हैं सारी चीजों को कि या यह कहिए या यह कहिए।
कहिए अंधेरा है, कहिए प्रकाश है। संध्या के रंग का हमारे पास कोई स्थान नहीं है, जो दोनों नहीं होता। ‘से ‘ की हमारी जिंदगी में कोई जगह नहीं है। या तो हम सफेद में तोड़ देते हैं या काले में तोड़ देते हैं। बल्कि सचाई ग्रे की ही ज्यादा है। ग्रे ही जरा सघन हो जाता है तो काला हो जाता है और जरा विरल हो जाता है तो सफेद हो जाता है। मगर उसकी कोई जगह नहीं है। या तो कहिए मित्र हैं, या कहिए शत्रु हैं, दोनों के बीच तीसरी कोई जगह नहीं है। असल में तीसरी ही असली जगह है। लेकिन उसका कोई स्थान नहीं है हमारी भाषा में, हमारे सोचने में, हमारे ढंग में।
आप मुझसे पूछते हैं कि मेरे मित्र हैं या शत्रु हैं। अगर मैं कहूं दोनों हूं, तो मुश्किल हो जाती है। क्योंकि फिर समझ मुश्किल हो जाती है कि दोनों कैसे हो सकते हैं। या मैं कहूं दोनों नहीं हूं, तो भी बेमानी हो जाती है। क्योंकि फिर कोई मतलब नहीं रहा। और सचाई यह है कि जब आदमी पूरी तरह स्वस्थ होगा, तो या तो दोनों होगा या दोनों नहीं होगा। यह दोनों एक ही बात को कहने के दो ढंग हैं। तब न तो वह शत्रु होगा, न मित्र होगा। और मेरा खयाल यह है कि तभी वह ठीक अर्थों में मनुष्य होगा। उसकी कोई शत्रुता नहीं, उसकी कोई मित्रता नहीं। उसका कोई संन्यास नहीं, उसका कोई संसार नहीं। तीसरे आदमी के लिए ही मेरी तलाश है। और जो सारी बातें मैं कह रहा हूं वे सिर्फ स्वप्न को तोड्ने के लिए हैं। और अगर स्वप्न टूट ही गया है, तो उन बातों का कोई भी अर्थ नहीं है।
एक कहानी तुमसे कहूं। एक झेन फकीर हुआ। सुबह उठा…….और उस फकीर का स्वप्नों के विश्लेषण पर बड़ा भरोसा था। हैं भी स्वप्न बड़े काम के। वे आदमी के संबंध में बड़ी खबरें लाते हैं। और चूंकि आदमी झूठा है, इसलिए स्वप्न से खबर मिल सकती है, झूठी चीजों से खबर मिल सकती है।
आदमी के चेहरे को दोपहर में जब तुम भरे बाजार में देखते हो, तब वह उतना सच्चा नहीं होता है, जितना रात के सपने में वह सच्चा होता है—सपना जो कि बिलकुल झूठा है। अगर दोपहर में तुमने उसे अपनी पत्नी को हाथ जोड़ते हुए और यह कहते देखा है कि तुझसे सुंदर कोई भी नहीं है, तो उसके सपने में पता लगाओ। उसकी पत्नी शायद ही उसके सपने में आती हो। और दूसरी स्त्रियां जरूर आती हैं। उसका सपना ज्यादा ठीक खबर देगा उसके बाबत—सपना जो कि झूठ है।
लेकिन आदमी झूठ है, इसलिए झूठ से ही पता लगाना पड़ेगा। अगर आदमी सच्चा होता, तो उसको जिंदगी सामने ही बता देती। सपने में जाने की कोई जरूरत नहीं थी, उसका चेहरा बता देता। वह अपनी पत्नी से कह देता कि तू बहुत ज्यादा सुंदर नहीं, पड़ोस की स्त्री बहुत सुंदर मालूम पड़ती है। वह दूसरी बात है, वैसा आदमी नहीं है। वैसा आदमी अगर हो, तो उसके सपने बंद हो जाएंगे। जो पति अपनी पत्नी से कह सकता है कि आज तो तेरे प्रति मेरे मन में कोई प्रेम नहीं उठता है, उस सड़क से जो औरत जा रही है, वह मेरे प्रेम को खींचे लेती है। इतनी सरलता से जो कह सकता है, उसके सपने बंद हो जाएंगे, क्योंकि उसके सपने में उस औरत को आने की कोई जरूरत नहीं है, उसने दिन में ही बात समाप्त कर ली है। बात रफा—दफा हो गई, सपना बचा नहीं।
सपना जो है, वह लिंगरिंग है। जो चीज नहीं हो पाई दिन में, जो नहीं कह पाया, नहीं जी पाया, वह भीतर बैठा है, वह रात में जीने की कोशिश करेगा। दिन भर झूठा रहा, इसलिए रात सपने में झूठ सचाइयां बनकर प्रकट होने लगेगा। इसलिए पूरा मनोविज्ञान आज का, चाहे फ्रायड हो, चाहे का हो, चाहे एडलर हो, सारा का सारा मनोविज्ञान सपने का विश्लेषण है।
यह बड़ी हैरानी की बात है कि आदमी को जानने के लिए सपने का विश्लेषण करना पड़ रहा है। ड्रीम एनालिसिस आदमी को जानने का रास्ता है। सोचो, इसका क्या मतलब होता है? आज अगर तुम एक मनोविश्लेषक के पास जाते हो, मनोवैज्ञानिक के पास जाते हो, मनोचिकित्सक के पास जाते हो, तो वह तुम्हारी फिक्र ही नहीं करता, वह कहता है, अपने सपने बताओ। क्योंकि तुम तो आदमी झूठे हो, तुम्हारे बाबत कुछ पूछना बेकार है, जरा तुम्हारे सपनों से पूछ लें। क्योंकि तुम झूठे आदमी हो, उन झूठे सपनों में बिलकुल साफ—साफ प्रकट हो जाते हो। वहां तुम्हारा रिफ्लेक्शन है, वहां तुम्हारी असली तस्वीर बनती है। हम तुम्हारे सपनों में झांकना चाहते हैं। सारा मनोविज्ञान सपने के विश्लेषण पर खड़ा हुआ है।

Thursday, 25 June 2015

तो मैं साधक को निरंतर यह स्मरण रखवाना चाहता हूं कि जो साधना वह कर रहा है, वह एक गहरे झूठ में उतर जाने का ऐंटीडोट है। और झूठ का ऐंटीडोट झूठ ही होगा। जहर को जहर ही काटेगा। सिर्फ विपरीत रुख होगा। लेकिन यह याद दिलाना जरूरी है, नहीं तो संसार तो छूटेगा, संन्यास पकड़ जाएगा। संसार तो छूट जाएगा और संन्यास पकड़ जाएगा। और दुकान तो छूट जाएगी, मंदिर पकड़ जाएगा। धन तो छूट जायेगा, ध्यान पकड जाएगा। और पकड़ना कुछ भी खतरनाक है। क्योंकि जो भी पकड़ जाएगा, वह बंधन बन जाएगा। वह चाहे धन हो, और चाहे ध्यान हो। ठीक साधना उस दिन जानना जिस दिन ध्यान की जरूरत न रह जाए, जिस दिन ध्यान बेकार हो जाए।
स्वभावत:, जो आदमी छत पर पहुंच गया है उसके लिए सीढ़ी बेकार हो जानी चाहिए। और अगर वह अब भी कहता है कि मेरे लिए सीढ़ी बड़े काम की है, तो समझना कि अभी छत पर नहीं पहुंचा। अभी कहीं सीडी पर ही खड़ा होगा। और हो सकता है कि सीडी के आखिरी चरण पर पहुंच जाये, आखिरी सोपान पर पहुंच जाए, और फिर भी अगर सीढ़ी को पकड़े रहे, तो ध्यान रखना छत से वह अभी भी उतना ही दूर है जितना सीडी के पहले सोपान पर था। छत पर नहीं पहुंचा। दोनों हालत में छत से दूर है। तुम सीढ़ी पूरी भी चढ़ जाओ, लेकिन अगर आखिरी चरण पर रुक जाओ, तो भी तुम पहुंचे कहां! हो तो तुम वहीं। सीडी पर फर्क पड़ गया। पहले तुम पहले सोपान पर थे सीडी के, अब सौवें सोपान पर हो। लेकिन हो सीडी पर। और जो सीडी पर है, वह छत पर नहीं है। छत पर होने के लिए दो काम करने पड़े, सीढ़ी चढ़नी पड़े और सीडी छोड़नी भी पड़े।
इसलिए मैं कहता हूं ध्यान का उपयोग भी है और साथ में कहता हूं कि ध्यान ऐंटीडोट से ज्यादा नहीं। इसलिए मैं कहता हूं, साधना करना भी और कहता हूं छोड़ना भी। और जब दोनों बातें मुझे कहनी हैं तो कठिनाई तो इसमें शुरू होगी ही, क्योंकि तुम सोचोगे ही स्वभावत: कि साधना के लिए इतनी बातें करते हैं आप कि यह करो, वह करो, और फिर कह देते हैं कि यह सब झूठा है। तो हमारे मन में होता है कि जब झूठा है तो करें ही क्यों! हमारा तर्क यह है कि जब सीडी से उतरना ही पड़ेगा तो हम चढ़े ही क्यों? लेकिन ध्यान रहे, अगर सीडी पर नहीं चढ़े, तब भी सीडी के बाहर रहोगे, और जो सीढ़ी पर चढ़कर छत पर उतर गया है, वह भी सीडी के बाहर हो गया है; लेकिन तुम दोनों के प्लेन अलग होंगे। वह छत पर होगा और तुम जमीन पर होओगे। तुम भी सीढ़ी पर नहीं हो, वह भी सीढ़ी पर नहीं है, लेकिन तुम दोनों में बुनियादी फर्क है। तुम सीढ़ी पर चढ़े नहीं, इसलिए सीडी के बाहर हो; वह सीडी पर चढ़ा और उतरा, इसलिए सीढ़ी के बाहर है।
और जिंदगी बड़ा राज है। उसमें कुछ चीजें चढ़नी भी पड़ती हैं और उतरनी भी पड़ती हैं। उसमें कभी कुछ पकड़ना भी पड़ता है और कभी कुछ छोड़ना भी पड़ता है। लेकिन हमारा मन कहता है कि अगर पकड़ना है तो फिर बिलकुल पकड़ो, अगर छोड़ना है तो बिलकुल छोड़ो। यह तर्क खतरनाक है। इससे जिंदगी में कभी कोई गति नहीं हो सकती।
तो चूंकि दोनों ही बातें मेरे खयाल में हैं और मैं देख रहा हूं कि ऐसी कठिनाई हो गई है कि कुछ लोगों ने धन को पकड़ा है, कुछ लोगों ने धर्म को पकड़ा हुआ है, कुछ लोगों ने संसार को पकड़ा है, किन्हीं ने मोक्ष को पकड़ा है, लेकिन पकड़ नहीं छूटती। और मुक्त वही है जिसकी कोई पकड़ नहीं है। और सत्य को वही जानेगा जिसकी कोई क्लिगिंग, कोई अटकाव, कोई रुकाव, जिसका कोई आग्रह नहीं है। सत्य को वही जानेगा जिसकी कोई शर्त नहीं है, जिसकी कोई कंडीशन नहीं है। अगर तुम्हारी इतनी भी शर्त है कि मैं मंदिर में ही रहूंगा, मैं दुकान पर न जाऊंगा, तो तुम सत्य को न जान सकोगे। तुम उसी सत्य को जान सकोगे जो मंदिर के झूठ के साथ पैदा होता है। अगर तुम्हारी इतनी भी शर्त है कि मैं इस भांति से ही जीऊंगा, संन्यासी की तरह जीऊंगा, अगर यह भी तुम्हारी शर्त है, तो तुम सत्य को न जान पाओगे।
तुम सीडी तो चढ़े, लेकिन आखिरी सोपान पर खड़े होकर तुमने सीडी पकड़ ली। कई दफे मन में होता भी है कि जिस सीडी ने इतनी दूर तक चढ़ाया, उसे एकदम छोड़ कैसे दें! उसे पकड़ लेने का मन हो जाता है। आम तौर से तभी तरफ यह होता है।